ऐसा मैंने सुना —
एक समय — भगवान् के परिनिर्वाण के थोडे ही समय बाद , आयुष्मान् आनन्द राजगृहमें वेणुवन कलन्दक-निवाप में विहार करते थे।
उस समय- मगधराज अजातशत्रु वैदेहिपुत्र राजा प्रद्यौत के भय से नगर को सुरक्षित कर रहा था। तब आयुष्मानफ आनन्द पूर्वान्ह समय पहिन कर पात्र चीवर के राजगृह में भिक्षा के लिये प्रविष्ठ हुए। तब आयुष्मान् आनन्द को यह हुआ — राजगृह में भिक्षाचार के लिये अभी बहुत सवेरा हैं, क्यों न मैं वहाँ गोपक-मोग्गलान (मौद्गल्यायन) ब्राम्हण की खेती (कर्मान्त) है, जहाँ गोपक मोग्गलान ब्राम्हण है, वहाँ चलूँ। तब आयुष्मान् आनन्द, जहाँ गोपक मोग्गलान ब्राम्हण था, वहाँ गये। गोपक मोग्गलान ब्राम्हण ने दूर से ही आयुष्मान् आनन्द को आते देखा। देखकर आयुष्मान आनन्द से यह बोला —
“आइये, आप आनन्द, स्वागत है, आप आनन्द का। चिरकाल के बाद आप आनन्द का यहाँ आना हुआ। आप आनन्द बैठिये, यह आसन बिछा है।”
आयुष्मान् आनन्द बिछे आसन पर बैठ गये। गोपक मोग्गलान ब्राम्हण भी एक नीचे आसन को लेर एक और बैठ गया। एक ओर बैठे गोपक मोग्गलान ब्राम्हण ने आयुष्मान् आनन्द से यह कहा —
“भो आनन्द ! क्या आप सब में एक भिक्षु भी (कोई) ऐसा है जो कि सारे के सारे सब तरह से सारे उन धर्मों (गुणों) से युक्त हो, जिनसे संयुक्त कि आप गौतम अर्हत् सम्यक् संबुद्ध थे?”
“नहीं ब्राम्हण! हममे एक भिक्षु भी ऐसा है जो कि सारे के सारे जिनसे संयुक्त कि वह भगवान् अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध थे। ब्राम्हण वह भगवान अनुत्पन्न मार्ग के उत्पादक, न जाने मार्ग के जाननहार, अन्-आख्यात् (न-कहे) मार्ग के आख्याता, मार्गज्ञ, मार्ग-विद् , मार्ग-कोविद् थे। पीछे से आये आजकल के श्रावक (बुद्ध शिष्य) मार्ग-अनुगामी हो विहर रहे हैं ?”
आयुष्मान् आनन्द और गोपक मोग्गलान ब्राम्हण के बीच यह कथा चल रही थी, कि उसी समय मगध-महामान्य बस्सकार (वर्पकार) ब्राम्हण राजगृह में होते (सैनिक तैयारी के) कामों की देखभाल करते जो गोपक मोग्गलाम ब्राम्ण का कर्मान्त (स्वकार वार) था जहां आयु ध्यान आनन्द थे, वहाँ गया, जाकर आयुष्मान् आनन्द के साथ संमोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे वर्षकार ब्राम्हण ने आयुष्मान् आनन्द से यह कहा —
“भो आनन्द ! किस बात को करते आप लोग बैठे थे, आप दोनों में क्या बात चल रही थी ?”
“ब्राम्हण ! अभी मुझे से गोपक मोग्गलान ब्राम्ण पूछ रहा था- भो आनन्द ! क्या एक भिक्षु भी संबुद्ध थे ? ऐसा पूछने पर ब्राम्हण ! मैंने गोपक मोग्गलान ब्राम्हण से यह कहा- “नहीं ब्राम्हण ! आजकल के श्रावक मार्ग अनुगामी हो विहर रहे हैं।” ब्राम्हण गोपक मोग्गालान ब्राम्हण के साथ हमारी यह कथा चल रही थी, कि तुम पहूँचे।”
“भो आनन्द ! क्या आप सबमें एक भिक्षुको भी उन आप गौतम ने (यह कह) स्थापित किया है- मेरे वाद यह तुम्हारा प्रतिशरण (आश्रयदाता) होगा। जिसका कि हर समय आप लोग अनुसरण करते हैं?”
“नहीं ब्राम्हण ! उन जानने वाले देखनेवाले, भगवान अर्हत् सम्यक् संबुद्ध ने एक भिक्षुको भी नहीं स्थापित किया — मेरे बाद यह तुम्हारा प्रतिशरण होगा, जिसका कि इस समय हम अनुसरण कर रहे हो।”
“भो आनन्द ! क्या आपमें एक भिक्षु भी ऐसा है, जो संघ से सम्मत हो, बहुत से स्थविर भिक्षुओं द्वारा (यह कह कर) स्थापित किया गया हो- भगवान् के बाद यह हमारा प्रतिशरण होगा, जिसका कि इस समय आप लोग अनुसारण करते हों ?”
“नहीं, ब्राम्हण ! एक भिक्षु भी ऐसा (नहीं) जो संघ से… जिसका कि इस समय हम अनुसरण कर रहे हो।”
“भो आनन्द ! इस प्रकार प्रतिशरण रहित होने पर एकता (सामग्री) का क्या हेतु है ?”
“ब्राम्हण ! हम प्रतिशरण-रहित नहीं हैं, ब्राम्हण ! हम धर्म-प्रतिशरण (धर्म है शरण जिनका) है ।”
“भो आनन्द ! आप सबमें एक भिक्षुको भी उन आप गौतम ने स्थापित किया है। पूछने पर — नहीं ब्राम्हण ! कहते हो। भो आनन्द ! एक भिक्षु भी, संघ से सम्मत ?” पूछने पर नहीं ब्राम्हण !कहतेहो । भो आनन्द ! प्रतिशरण रहित ?” पूछने पर हम धर्म प्रतिशरण हैं- कहते हो। भो आनन्द ! आपके इस कथन का अर्थ कैसे समझना चाहिये ?”
“ब्राम्हण ! उन जाने वाले, भगवान, ने भिक्षुओं के शिक्षाप्रद (नियम) को प्रज्ञापन किया है, प्रतिमोक्ष कथित किया है। सो प्रत्येक उपोस्त्रथ (अमावस्या, पूर्णिमा) को हम जितने (भिक्षु) एक गाँव खेत के पास विहरते हैं, वह सब एक जगह एकत्रित होते हैं, एकत्रित हो उस (प्रतिमोक्ष) को अध्ययन (पाठ) करते हैं। उसके पाठ करते समय यदि किसी भिक्षु से कोई आपत्ति (पाप) व्यातिक्रम (कसूर) हुआ रहता है, तो उसका (प्रतीकार) कराता है।”
“भो आनन्द ! क्या इस समय एक भिक्षु भी आप सबने ऐसा है, जिसका आप सब सत्कार-गुरूकार, मानव- पूजन करते हो। सत्कार- गुरूकार करके उसके समीप विहार करते हों ?”
“है, ब्राम्हण ! ऐसा एक भिक्षु, जिसका हम सत्कार करके उसके समीप विहार करते हो।”
“भो, आनन्द !- आप सबमें एक भिक्षुओं को भी। हम धर्म-प्रतिशरण हैं- कहते हो। — भे आनन्द ! क्या एक भिक्षु भी ऐसा है, जिसका आप सब सत्कार करके, उसके समीप विहार करते हैं ? — पूछने पर- है। ऐसा एक भिक्षु, कहते हैं। भो आनन्द ! आपके इस कथन का अर्थ कैसे समझना चाहिये ?”
“ब्राम्हण उन — भगवान् अर्हंत् सम्यक् सम्बुद्ध ने दश प्रसादनीय ( श्रद्धा उत्पादन करने वाले ) धर्म कहे हैं। जिसमें वह धर्म होते हैं, उसका हम सत्कार- गुरूकार, मानन — पूजन करते हैं। सत्कार — गुरूकार करके, उसके समीप विहार करते हैं। कौनसे दस ?-
(1) “यहाँ, ब्राम्हण ! भिक्षु शीलवान, प्रातिमोक्ष-संवर (भिक्षु-नियमरूपी संयम) से संवृत्त (संयत) होता है, आचार-गोचर (सदाचार) से सम्पन्न हो। शिक्षा पदों को ग्रहण कर अभ्यास करता है।
(2) ”(जो भिक्षु) बहुश्रुत, श्रुतधर (पढे को धारण करने वाला), श्रुत-संचयी होता है। जो वह धर्म आदि का कल्याण, मध्य कल्याण, पर्यवसान (अन्त्य)-कल्याण हैं, सार्थक-सव्यंजन हैं, (और जो) केवल परिपूर्ण, परिशुद्ध, ब्रम्हचर्य की प्रशंसा करते हैं, वैसे धर्म (उपदेश) उसने बहुत सुने होते हैं, धारण किये (होते हैं,) वचन से परिचित, मनसे समीक्षित और दृष्टि (दर्शन) दिल की आँख से सुप्रतिबिद्ध (सुविदित) होते हे।
(3) ”(जो भिक्षु), वस्त्र, भोजन, शयन-आसन और रोगी के पथ्य औषध में (थोडे से) सन्तुष्ट रहने वाला होता है।
(4) “अभिचेतसिक ( चित्त संबंधी) इसी शरीर में सुख पूर्वक विहार करने के उपयोगी चारों ध्यानों का पूर्णतया लामी, अ-कृच्छ्र लाभी बिना कठिनाई के प्राप्त करने वाला होता है।
(5) “अनेक प्रकार की ऋद्धियों को अभुव करता है — एक होकर अनेक हो जाता है, अविर्भाव (इसी) काया से ब्रम्हलोक-पर्यन्त (सब) को अपने वश में करनेवाला होता है।
(6) “अमानुष विशुद्ध दिव्य श्रोत्र इन्द्रिय (धातु) से उभय प्रकार के शब्दों को सुनता है — दिव्य (शब्दों) को भी और मानुष शब्दों को भी, दूरवाले को भी और समीपवाले शब्द को भी।
(7) दूसरे सत्त्वों दूसरे पुद्गलों (व्यक्तियों) के चित्तों को अपने चित्त से देखकर जान लेताहै। अ-विमुक्त चित्त के होने पर अविमुक्त चित्त है — जानता है।
(8) “अनेक प्रकार के पूर्व निवासों (पूर्व जन्मों) को जानता है जैसे कि एक जन्म को भी।
(9) अ-मानुष विशुद्ध दिव्य चक्षु से अच्छे बुरे, सुवर्ण दुर्वर्ण, प्राणियों को पहिचानता है।
(10) “जो भिक्षु आश्रवों के क्षय से जो आस्त्रव रहित चित्त की विमुक्ति है, प्रज्ञा द्वारा विमुक्ति (मुक्ति) है, उसे इसी जन्म में स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर प्राप्त कर विहार करता है।
“ब्राम्हण ! उन भगवान यह दश प्रसादनीय धर्म कहे हैं। उसके समीप हम विहार करते हैं।”
ऐसा कहने पर, वर्षकार ब्राम्हण ने उपनन्द सेनापति को सम्बोधित किया-
“तो क्या मानते हो, सेनापति ! ऐसा होने पर यह आप लोग सत्करणीय ही का सत्कार कर रहे हैं, गुरूकरणीयहीका गुरूकार कर रहे हैं, माननीय पूजनीय ही की पूजा कर रहे हैं ?”
“जरूर, यह आप लोग, पूजनीय ही की पूजा कर रहे हैं, ऐसे पुरूष का यदि यह आप लोग सत्कार न करें, पूजा न करे, तो कैसे का सत्कार, पूजा करेंगे (किसका) सत्कार पूजा करके उसके समीप (सहारे) विहार करेंगे ?”
तब मगध महामात्य (महामत्री) के आयुष्मान आनन्द से यह कहा —
“कहाँ आप आनन्द इस समय विहार करते (रहते हैं) ?
“वेणुवन में ब्राम्हण ! इस समय मैं रहता हॅू।”
“भो आनन्द ! वेणुवन रमणीय अल्प-शब्द, अल्प निर्घोष, बिजन वात (आदमियों की भीड से रहित), मनुष्यों से एकान्त ध्यान के लायक तो है न ?”
“हाँ ब्राम्हण ! वेणुवन ध्यान के लायक है क्योंकि तुम्हारे जैसे रक्षक-गोपक जो हैं।”
“अच्छा तो हो आनन्द! वेणुवन ध्यान के लायक है। जहां कि आप लोगों जैसे ध्यायी, ध्यानशीली रहते हैं। आप लोग ध्यायी- ध्यानशीली हैं। एक समय भो आनन्द यह आप गौतम वैशाली में महावन की कूटागार-शाला में विहार करते थे। तब, भो आनन्द मैं जहां महावन में कुटागार शाला थी, जहां आप गौतम थे, वहां गया। वहाँ आप गौतम अनेक प्रकार से ध्यान की बात कर रहे थे। वह आप गौतम ध्यायी थे, ध्यान-शीली थे। वह आप गौतम अनेक प्रकास से ध्यान की बात कर रहे थे। वह आप गौतम ध्यायी थे, ध्यान शीली थे। वह आप गौतम इन सबको वर्णित (प्रशंसित कर रहे थे।”
“ब्राम्हण! यहाँ कोई (पुरूष) काम-राग (विषय-कामना) से पर्युस्थित (व्याप्त) काम-राग परेत चित्त से विहरता है।, (वह) उत्पन्न काम-राग के निस्सरण (निकास) को नहीं जानता। वह काम-राग (विषय-कामना) को ही बीच में करके ध्यान-प्रध्यान-निध्यान-अपध्यान करता है। व्यापाद् (द्वेष) से पर्युस्थित, विचिकित्सा (संशय) से पर्युस्थित ब्राम्हण ! वह भगवान इस प्रकार के ध्यान की प्रशंसा न करते थे।”
“ब्राम्हण ! किस प्रकार क ध्यान की वह भगवान् प्रशंसा करते थे ?-ब्राम्हण ! यहां भिक्षु कामों से रहित प्रथम ध्यान को विहरता है। वितर्क और विचार के शान्त होने पर द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। प्रीति से विरक्त हो, तृतीय ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। सुख और दुख के परित्याग से चतर्थ ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ब्राम्हण् वह भगवान इस प्रकार के ध्यान की प्रशंसा करते थे।”
“भो आनन्द ! वह आप गौतम निन्दनीय ध्यान की निन्दा करते थे, प्रशंसनीय की प्रशंसा करते थे। हन्त अब भो आनन्द ! हम जायेंगे, हम बहु-कृत्य बहुकरणीय हैं।”
“ब्राम्हण ! जिसका इस समय तुम काल समझते हो (वैसा करो)।”
तब मगध-महामात्य वर्षकार ब्राम्हण आयुष्मान आनंद के भाषण को अभिनंदित अनुमोदित कर आसन से उठकर चला गया।
तब मगध-महामात्य के चले जाने के थोडी ही देर बाद गोपक मोग्गलान ब्राम्ण ने आयुष्मान् आनंद से यह कहा-
“जो हमने आप आनंद से पूछा था, वह हमें आप आनंद ने नहीं बतलाया ?”
“ब्राम्हण ! हमने कहा न- नहीं, ब्राम्हण ! हममे एक भिक्षु भी ऐसा नहीं है … । आज कल के श्रावक मार्ग अनुगामी हो विहर रहे हैं।”
टीकाएँ [4]
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