ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवंत उक्कठ के पास, सुभग वन में सालराज के जड़ पर विहार कर रहे थे। वहां भगवंत ने भिक्षुओं से कहा: “भिक्षुओं!।
“भदंत”, भिक्षुओं ने जवाब दिया। भगवंत ने एैसा कहा:
“भिक्षुओं, मैं सभी र्धर्मों के मूल का उपदेश सिखाता हूँ। उसे सुनो, और अच्छी तरह से मन में धारण करो, कहता हूँ”।
“हां भंते”, भिक्षुओं ने जवाब दिया। भगवंत ने ऐसा कहा:
“अब, भिक्षुओं, एक अज्ञानी सामान्य मनुष्य जो आर्यों के दर्शन से वंचित है, जिस ने आर्यों के धर्म को सुना नहीं, जो आर्यधर्म से अंजान है, जो सज्जनों के दर्शन से वंचित है, जिस ने सज्जनों के धर्म को सुना नहीं, जो सज्जनों के धर्म से अंजान है—वह पृथ्वी को पृथ्वी समझता है; पृथ्वी को पृथ्वी समझकर स्वयं को पृथ्वी मानता है, स्वयं को पृथ्वी में मानता है, स्वयं को पृथ्वी से अलग मानता है, पृथ्वी मेरी है ऐसा मानता है, पृथ्वी में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हुं।
वह पानी को पानी समझता है; पानी को पानी समझकर स्वयं को पानी मानता है, स्वयं को पानी में मानता है, स्वयं को पानी से अलग मानता है, पानी मेरा है ऐसा मानता है, पानी में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
वह अग्नि को अग्नि समझता है; अग्निको अग्नि समझकर स्वयं को अग्नि मानता है, स्वयं को अग्नि में मानता है, स्वयं को अग्नि से अलग मानता है, अग्नि मेरी है ऐसा मानता है, अग्नि में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
वह वायु को वायु समझता है; वायु को वायु समझकर स्वयं को वायु मानता है, स्वयं को वायु में मानता है, स्वयं को वायु से अलग मानता है, वायु मेरा है ऐसा मानता है, वायु में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
वह प्राणियों को प्राणी समझता है; प्राणियों को प्राणी समझकर स्वयं को प्राणी मानता है, स्वयं को प्राणियों में मानता है, स्वयं को प्राणियों से अलग मानता है, प्राणी मेरे हैं ऐसा मानता है, प्राणियों में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
वह देवों को देव समझता है; देवों को देव समझकर स्वयं को देव मानता है, स्वयं को देवों में मानता है, स्वयं को देवों से अलग मानता है, देव मेरे हैं ऐसा मानता है, देवों में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
वह प्रजापति को प्रजापति समझता है; प्रजापति को प्रजापति समझकर स्वयं को प्रजापति मानता है, स्वयं को प्रजापति में मानता है, स्वयं को प्रजापतिसे अलग मानता है, प्रजापति मेरे हैं ऐसा मानता है, प्रजापति में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
वह ब्रह्मा को ब्रह्मा समझता है; ब्रह्मा को ब्रह्मा समझकर स्वयं को ब्रह्मा मानता है, स्वयं को ब्रह्मा में मानता है, स्वयं को ब्रह्मा से अलग मानता है, ब्रह्मा मेरे हैं ऐसा मानता है, ब्रह्मा में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
वह आभास्वर देवों को आभास्वर देव समझता है; आभास्वर देवों को आभास्वर देव समझकर स्वयं को आभास्वर देव मानता है, स्वयं को आभास्वर देवों में मानता है, स्वयं को आभास्वर देवों से अलग मानता है, आभास्वर देव मेरे हैं ऐसा मानता है, आभास्वर देवों में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
शुभकृत देवों को शुभकृत देव समझता है; शुभकृत देवों को शुभकृत देव समझकर स्वयं को शुभकृत देव मानता है, स्वयं को शुभकृत देवों में मानता है, स्वयं को शुभकृत देवों से अलग मानता है, शुभकृत देव मेरे हैं ऐसा मानता है, शुभकृत देवों में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
महाफलधारी देवों को महा़फलधारी देव समझता है; महाफलधारी देवों को महाफलधारी देव समझकर स्वयं को महाफलधारी देव मानता है, स्वयं को महाफलधारी देवों में मानता है, स्वयं को महाफलधारी देवों से अलग मानता है, महाफलधारी देव मेरे हैं ऐसा मानता है, महाफलधारी देवों में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
अभिभू देवों को अभिभू देव समझता है; अभिभू देवों को अभिभू देव समझकर स्वयं को अभिभू देव मानता है, स्वयं को अभिभू देवों में मानता है, स्वयं को अभिभू देवों से अलग मानता है, अभिभू देव मेरे हैं ऐसा मानता है, अभिभू देवों में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान समझता है; अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान समझकर स्वयं को अनंत आकाश का मनोस्थान मानता है, स्वयं को अनंत आकाश के मनोस्थान में मानता है, स्वयं को अनंत आकाश के मनोस्थान से अलग मानता है, अनंत आकाश का मनोस्थान मेरा है ऐसा मानता है, अनंत आकाश के मनोस्थान में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान समझता है; अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान समझकर स्वयं को अनंत चेतना का मनोस्थान मानता है, स्वयं को अनंत चेतना के मनोस्थान में मानता है, स्वयं को अनंत चेतना के मनोस्थान से अलग मानता है, अनंत चेतना का मनोस्थान मेरा है ऐसा मानता है, अनंत चेतना के मनोस्थान में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
सर्व अभाव के मनोस्थान को सर्व अभाव का मनोस्थान समझता है; सर्व अभाव के मनोस्थान को सर्व अभाव का मनोस्थान समझकर स्वयं को सर्व अभाव का मनोस्थान मानता है, स्वयं को सर्व अभाव के मनोस्थान में मानता है, स्वयं को सर्व अभाव के मनोस्थान से अलग मानता है, सर्व अभाव का मनोस्थान मेरा है ऐसा मानता है, सर्व अभाव के मनोस्थान में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान समझता है; संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञान और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान समझकर स्वयं को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान मानता है, स्वयं को संज्ञा और असंज्ञा के अभावके मनोस्थान में मानता है, स्वयं को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान से अलग मानता है, संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान मेरा है ऐसा मानता है, संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
देखे हुए को देखा हुआ समझता है; देखे हुए को देखा हुआ समझकर स्वयं को देखा हुआ मानता है, स्वयं को देखे हुए में मानता है, स्वयं को देखे हुए से अलग मानता है, देखा हुआ मेरा है ऐसा मानता है, देखे हुए में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
सुने हुए को सुना हुआ समझता है; सुने हुए को सुना हुआ समझकर स्वयं को सुना हुआ मानता है, स्वयं को सुने हुए में मानता है, स्वयं को सुने हुए से अलग मानता है, सुना हुआ मेरा है ऐसा मानता है, सुने हुए में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
संवेदित को संवेदित समझता है; संवेदित को संवेदित समझकर स्वयं को संवेदित मानता है, स्वयं को संवेदित में मानता है, स्वयं को संवेदित से अलग मानता है, संवेदित मैं हुं ऐसा मानता है, संवेदित में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
जाने हुए को जाना हुआ समझता है; जाने हुए को जाना हुआ समझकर स्वयं को जाना हुआ मानता है, स्वयं को जाने हुए में मानता है, स्वयं को जाने हुए से अलग मानता है, जाना हुआ मेरा है ऐसा मानता है, जाने हुए में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
एकता को एकता समझता है; एकता को एकता समझकर स्वयं को एकता मानता है, स्वयं को एकता में मानता है, स्वयं को एकता से अलग मानता है, एकता मेरी है ऐसा मानता है, एकता में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
विविधता को विविधता समझता है; विविधता को विविधता समझकर स्वयं को विविधता मानता है, स्वयं को विविधता में मानता है, स्वयं को विविधता से अलग मानता है, विविधता मेरी है ऐसा मानता है, विविधता में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
सर्व को सर्व समझता है; सर्व को सर्व समझकर स्वयं को सर्व मानता है, स्वयं को सर्व में मानता है, स्वयं को सर्व से अलग मानता है, सर्व मेरा है ऐसा मानता है, सर्व में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
निर्वाण को निर्वाण समझता है; निर्वाण को निर्वाण समझकर स्वयं को निर्वाण मानता है, स्वयं को निर्वाण में मानता है, स्वयं को निर्वाण से अलग मानता है, निर्वाण मेरा है ऐसा मानता है, निर्वाण में आनंद लेता है। ऐसा किस लिये? ‘उसे ठीक से समझा नहीं’, कहता हूँ।
सामान्य जन के प्रथम भूमिपरिच्छेदकी पूर्णता।
भिक्षुओं, जो भिक्षु शिष्य है, जिसने ध्येय पूर्ण नही किया किंतु जिसे बंधन से मुक्ति के सर्वश्रेष्ठ आश्रयकी आकांशा है वह भी प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को पृथ्वी के तौर से जानता है; परंतु प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को पृथ्वी के तौर से जानकर उन्हें स्वयं को पृथ्वी नहीं मानना चाहिए, स्वयं को पृथ्वी में नहीं मानना चाहिए, स्वयं को पृथ्वी से अलग नहीं मानना चाहिए, पृथ्वी मेरी है ऐसा नहीं मानना चाहिए, पृथ्वी में आनंद नहीं लेना चाहिए। ऐसा किस लिये? ‘उन्हे संपूर्णपूर्वक समझमें आए इस लिए ’, कहता हुं।
पानी को पानी … अग्नि को अग्नि … वायु को वायु … प्राणियों को प्राणी … देवों को देव … प्रजापति को प्रजापति … ब्रह्मा को ब्रह्मा … आभास्वर देवों को आभास्वर देव … शुभकृत देवों को शुभकृत देव … महाफलधारी देवों को महा़फलधारी देव … अभिभू देवों को अभिभू देव … अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान … अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान … सर्व अभाव के मनोस्थान को सर्व अभाव का मनोस्थान … संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान … देखे हुए को देखा हुआ … सुने हुए को सुना हुआ … संवेदित को संवेदित … जाने हुए को जाना हुआ … एकता को एकता … विविधता को विविधता … सर्व को सर्व … निर्वाण को प्रत्यक्ष रूप से निर्वाण के तौर से जानता है। परंतु निर्वाण को प्रत्यक्ष रूप से निर्वाण के तौर से जानकर स्वयं को निर्वाण नहीं मानना चाहिए, स्वयं को निर्वाण में नहीं मानना चाहिए, स्वयं को निर्वाण से अलग नहीं मानना चाहिए, निर्वाण मेरा है ऐसा नहीं मानना चाहिए, निर्वाण में आनंद नहीं लेना चाहिए। ऐसा किस लिये? ‘उन्हें संपूर्ण पूर्वक समझ में आए इस लिए ’, कहता हुं।
शिष्य की द्वितीय भूमिपरिच्छेदकी पूर्णता।
भिक्षुओं, जो भिक्षु अशुद्धियों के अंत द्वारा अरहंत हुए हैं, जिन्हों ने धार्मिक जीवन जिया है, जो करना था वह किया है, बोझ रख दिया है, स्वयं का ध्येय सिद्ध किया है, अस्तित्व के बंधन का संपूर्णपूर्वक विनाश किया है, जो सम्मज्ञान द्वारा संपूर्णपूर्वक मुक्त हुए हैं, वह भी प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को पृथ्वी के तौर से जानते हैं; पृथ्वी को प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी जानकर स्वयं को पृथ्वी नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी में नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी से अलग नहीं मानते, पृथ्वी मेरी है ऐसा नहीं मानते, पृथ्वी में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? ‘उन्हें संपूर्ण पूर्वक समझ में आया है इस लिए’, कहता हुं।
पानी को पानी … अग्नि को अग्नि … वायु को वायु … प्राणीयों को प्राणी … देवों को देव … प्रजापति को प्रजापति … ब्रह्मा को ब्रह्मा … आभास्वर देवों को आभास्वर देव … शुभकृत देवों को शुभकृत देव … महाफलधारी देवों को महा़फलधारी देव … अभिभू देवों को अभिभू देव … अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान … अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान … सर्व अभावके मनोस्थान को सर्वअभाव का मनोस्थान … संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान … देखे हुए को देखा हुआ … सुने हुए को सुना हुआ … संवेदित को संवेदित … जाने हुए को जाना हुआ … एकता को एकता … विविधता को विविधता … सर्व को सर्व … निर्वाण को निर्वाण … निर्वाण को प्रत्यक्ष रूपसे निर्वाण के तौरसे जानकर स्वयं को निर्वाण नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण में नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण से अलग नहीं मानते, निर्वाण मेरा है ऐसा नहीं मानते, निर्वाण में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? ‘उन्हें संपूर्ण पूर्वक समझ में आया है इस लिए ’, कहता हुं।
आसव विनाशित के तिसरी भूमिपरिच्छेदकी पूर्णता।
भिक्षुओं, जो भिक्षु अशुद्धियों के अंत द्वारा अरहंत हुए है, जिन्हों ने धार्मिक जीवन जिया है, जो करना था वो किया है, बोज़ रख दिया है, खुदका ध्येय सिद्ध किया है, अस्तित्व के बंधन का संपूर्णपूर्वक विनाश किया है, जो सम्मज्ञान द्वारा संपूर्णपूर्वक मुक्त हुए है, वह भी प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को पृथ्वी के तौर से जानते हैं; पृथ्वीको प्रत्यक्ष रूपसे पृथ्वीके तौरसे जानकर स्वयं कोको पृथ्वी नहि मानते, खु़दको पृथ्वीमे नहि मानते, खु़दको पृथ्वीसे अलग नहि मानते, पृथ्वी मेरी है ऍसा नहीं मानते, पृथ्वीमे आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? क्योंकि वह लालसा के विनाश से लालसा से मुक्त हैं।
पानी को पानी … अग्नि को अग्नि … वायु को वायु … प्राणियों को प्राणी … देवों को देव … प्रजापति को प्रजापति … ब्रह्मा को ब्रह्मा … आभास्वर देवों को आभास्वर देव … शुभकृत देवों को शुभकृत देव … महाफलधारी देवों को महा़फलधारी देव … अभिभू देवों को अभिभू देव … अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान … अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान … सर्व अभाव के मनोस्थान को सर्व अभाव का मनोस्थान … संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान … देखे हुए को देखा हुआ … सुने हुए को सुना हुआ … संवेदित को संवेदित … जाने हुए को जाना हुआ … एकता को एकता … विविधता को विविधता … सर्व को सर्व … निर्वाण को निर्वाण … निर्वाण को प्रत्यक्ष रूपसे निर्वाण के तौर से जानकर स्वयं को निर्वाण नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण में नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण से अलग नहीं मानते, निर्वाण मेरा है ऐसा नहीं मानते, निर्वाण में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? क्योंकि वह लालसा के विनाश से लालसा से मुक्त हैं।
आसवविनाशित के चौथे भूमिपरिच्छेदकी पूर्णता।
भिक्षुओं, जो भिक्षु अशुद्धियों के अंत द्वारा अरहंत हुए हैं, जिन्हों ने धार्मिक जीवन जिया है, जो करना था वो किया है, बोझ रख दिया है, स्वयं का ध्येय सिद्ध किया है, अस्तित्व के बंधन का संपूर्णपूर्वक विनाश किया है, जो सम्मज्ञान द्वारा संपूर्णपूर्वक मुक्त हुए हैं, वह भी प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को पृथ्वी के तौर से जानते हैं; पृथ्वी को प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के तौर से जानकर स्वयं को पृथ्वी नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी में नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी से अलग नहीं मानते, पृथ्वी मेरी है ऐसा नहीं मानते, पृथ्वी में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? क्योंकि वह द्वेष के विनाश से द्वेष से मुक्त हैं।
पानी को पानी … अग्नि को अग्नि … वायु को वायु … प्राणियों को प्राणी … देवों को देव … प्रजापति को प्रजापति … ब्रह्मा को ब्रह्मा … आभास्वर देवों को आभास्वर देव … शुभकृत देवों को शुभकृत देव … महाफलधारी देवों को महा़फलधारी देव … अभिभू देवों को अभिभू देव … अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान … अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान … सर्व अभाव के मनोस्थान को सर्व अभाव का मनोस्थान … संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान … देखे हुए को देखा हुआ … सुने हुए को सुना हुआ … संवेदित को संवेदित … जाने हुए को जाना हुआ … एकता को एकता … विविधता को विविधता … सर्व को सर्व … निर्वाण को निर्वाण … निर्वाण को प्रत्यक्ष रूप से निर्वाण के तौर से जानकर स्वयं को निर्वाण नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण में नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण से अलग नहीं मानते, निर्वाण मेरा है ऐसा नहीं मानते, निर्वाण में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? क्योंकि वह द्वेष के विनाश से द्वेष से मुक्त हैं।
आसव विनाश के पांचवी भूमिपरिच्छेद की पूर्णता।
भिक्षुओं, जो भिक्षु अशुद्धियों के अंत द्वारा अरहंत हुए हैं, जिन्हों ने धार्मिक जीवन जिया है, जो करना था वह किया है, बोझ रख दिया है, स्वयं का ध्येय सिद्ध किया है, अस्तित्व के बंधन का संपूर्णपूर्वक विनाश किया है, जो सम्मज्ञान द्वारा संपूर्णपूर्वक मुक्त हुए हैं, वह भी प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को पृथ्वी के तौर से जानते हैं; पृथ्वी को प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी जानकर स्वयं को पृथ्वी नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी में नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी से अलग नहीं मानते, पृथ्वी मेरी है ऐसा नहीं मानते, पृथ्वी में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? क्योंकि वह मोह के विनाश से मोह से मुक्त हैं।
पानी को पानी … अग्नि को अग्नि … वायु को वायु … प्राणियों को प्राणी … देवों को देव … प्रजापति को प्रजापति … ब्रह्मा को ब्रह्मा … आभास्वर देवों को आभास्वर देव … शुभकृत देवों को शुभकृत देव … महाफलधारी देवों को महा़फलधारी देव … अभिभू देवों को अभिभू देव … अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान … अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान … सर्व अभावके मनोस्थान को सर्व अभाव का मनोस्थान … संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान … देखे हुए को देखा हुआ … सुने हुए को सुना हुआ … संवेदित को संवेदित … जाने हुए को जाना हुआ … एकता को एकता … विविधता को विविधता … सर्व को सर्व … निर्वाण को निर्वाण … निर्वाण को प्रत्यक्ष रूप से निर्वाण के तौर से जानकर स्वयं को निर्वाण नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण में नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण से अलग नहीं मानते, निर्वाण मेरा है ऐसा नहीं मानते, निर्वाण में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? क्योंकि वह मोह के विनाश से मोह से मुक्त हैं।
आसवविनाशितके छठे भूमिपरिच्छेदकी पूर्णता।
अरहंत, सम्मसंबुध्ध, तथागत भी पृथ्वी को प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के तौर से जानते हैं; पृथ्वी को प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के तौर से जानकर स्वयं को पृथ्वी नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी में नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी से अलग नहीं मानते, पृथ्वी मेरी है ऐसा नहीं मानते, पृथ्वी में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? ‘तथागत को संपूर्ण रूप से अंत तक समझ में आया है इस लिए ’, कहता हुं।
पानी को पानी … अग्नि को अग्नि … वायु को वायु … प्राणियों को प्राणी … देवों को देव … प्रजापति को प्रजापति … ब्रह्मा को ब्रह्मा … आभास्वर देवों को आभास्वर देव … शुभकृत देवों को शुभकृत देव … महाफलधारी देवों को महा़फलधारी देव … अभिभू देवों को अभिभू देव … अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान … अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान … सर्व अभाव के मनोस्थान को सर्व अभाव का मनोस्थान … संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान … देखे हुए को देखा हुआ … सुने हुए को सुना हुआ … संवेदित को संवेदित … जाने हुए को जाना हुआ … एकता को एकता … विविधता को विविधता … सर्व को सर्व … निर्वाण को निर्वाण … निर्वाण को प्रत्यक्ष रूप से निर्वाण के तौर से जानकर स्वयं को निर्वाण नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण में नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण से अलग नहीं मानते, निर्वाण मेरा है ऐसा नहीं मानते, निर्वाण में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? ‘तथागत को संपूर्ण रूप से अंत तक समझ में आया है इस लिए ’, कहता हुं।
तथागत की सातवी भूमिपरिच्छेदकी पूर्णता।
अरहंत, सम्मसंबुध्ध, तथागत भी पृथ्वी को प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के तौर से जानते हैं; पृथ्वी को प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के तौर से जानकर स्वयं को पृथ्वी नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी में नहीं मानते, स्वयं को पृथ्वी से अलग नहीं मानते, पृथ्वी मेरी है ऐसा नहीं मानते, पृथ्वी में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? ‘आनंद लेने की वृत्ति दु:ख का मूल है’—और ‘अस्तित्व के कारण से जन्म होता है और जो जनम लेता है उसे वृद्धता और मृत्यु का अनुभव होता है’। इस लिए भिक्षुओं, ‘तृष्णा के संपूर्ण विनाश वैराग्य निरोध त्याग और छुटकारे से तथागत सर्वश्रेष्ठ सम्मसंबुद्धि में जागृत हुए हैं’, कहता हुं।
पानी को पानी … अग्नि को अग्नि … वायु को वायु … प्राणियों को प्राणी … देवों को देव … प्रजापति को प्रजापति … ब्रह्मा को ब्रह्मा … आभास्वर देवों को आभास्वर देव … शुभकृत देवों को शुभकृत देव … महाफलधारी देवों को महा़फलधारी देव … अभिभू देवों को अभिभू देव … अनंत आकाश के मनोस्थान को अनंत आकाश का मनोस्थान … अनंत चेतना के मनोस्थान को अनंत चेतना का मनोस्थान … सर्व अभाव के मनोस्थान को सर्व अभाव का मनोस्थान … संज्ञा और असंज्ञा के अभाव के मनोस्थान को संज्ञा और असंज्ञा के अभाव का मनोस्थान … देखे हुए को देखा हुआ … सुने हुए को सुना हुआ … संवेदित को संवेदित … जाने हुए को जाना हुआ … एकता को एकता … विविधता को विविधता … सर्व को सर्व … निर्वाण को निर्वाण … निर्वाण को प्रत्यक्ष रूप से निर्वाण के तौर से जानकर स्वयं को निर्वाण नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण में नहीं मानते, स्वयं को निर्वाण से अलग नहीं मानते, निर्वाण मेरा है ऐसा नहीं मानते, निर्वाण में आनंद नहीं लेते। ऐसा किस लिये? ‘आनंद लेने की वृत्ति दु:ख का मूल है’—और ‘अस्तित्वके कारण से जन्म होता है और जो जनम लेता है उसे वृद्धता और मृत्यु का अनुभव होता है’। इस लिए भिक्षुओ, ‘तृष्णा के संपूर्ण विनाश वैराग्य निरोध त्याग और छुटकारे से तथागत सर्वश्रेष्ठ सम्मसंबुध्धि में जागृत हुए हैं’, कहता हुं।
तथागत की आठवी भूमिपरिच्छेदकी पूर्णता।
भगवंत ने ऐसा कहा: किंतु वह भिक्षुओं को भगवंत के वचनों में आनंद नहीं आया।
प्रथम मूलपरियायसूत्र की समाप्ति।
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