ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।
उस समय राजा प्रसेनजित् के राज्य में रूद्र, लोहित-पाणि, मार-काट में संलग्न, प्राणि-भूतों में दया-रहित अंगुलिमाल नामक डाकू (=चोर) था। उसने ग्रामों को भी अ-ग्राम कर दिया था, निगमों को भी अ-निगम ॰, जन-पद को भी अ-जनपद ॰। तब भगवान् पूर्वाह्न समय पहिनकर, पात्र-चीवर ले श्रावस्ती में पिंड के लिये प्रविष्ट हुए। श्रावस्ती में पिंड-चार करके भोजन बाद…शयनासंन सँभाल, पात्र-चीवर ले जहाँ, डाकू अंगुलिमाल रहता था, उसी रास्ते चले। गोपालको, पशुपालकों, कृषकों, राहगीरों ने भगवान् को, जिधर डाकू अंगुलिमाल था, उसी रास्ते पर (जाते) हुये देखा। देखकर भगवान् से यह कहा—
“मत श्रमण! इस रास्ते जाओ। इस मार्ग में श्रमण! ॰ अंगुलिमाल नामक डाकू रहता है। उसने ग्रामों को भी अ-ग्राम ॰। वह मनुष्यों को मार मारकर अंगुलियों की माला पहनता है। इस मार्ग पर श्रमण! बीस पुरूष, तीस पुरूष, चालीस ॰, पचास पुरूष तक इकट्ठा होकर जाते हैं, वही भी अंगुलिमाल के हाथ में पड जाते हैं।”
ऐसा कहने पर भगवान् मौन धारण कर चलते रहे।
दूसरी बार भी गोपालको ॰। तीसरी बार भी गोपलकों ॰।
डाकू अंगुलिमाल ने दूर से ही भगवान् को आते देखा। देखकर उसको यह हुआ—‘आश्चर्य है जी! अद्भूत है जी (=भो)!! इस रास्ते दस पुरूष भी, ॰ पचास पुरूष भी इकट्ठा होकर चलते है, वह भी मेरे हाथ में पड जाते है। और यह श्रमण अकेला=अद्वितीय मानो मेरा तिरस्कार करता आ रहा है। क्यों न मैं इस श्रमण को जान से मपर दूँ।’ तब डाकू अंगुलिमाल ढाल-तलवार (=असि-चर्म) लेकर तीर-धनुष चढा, भगवान् के पीछे चला। तब भगवान् ने इस प्रकार का योग-बल प्रकट किया, कि डाकू अंगुलिमाल मामूली चाल सेचलते भगवान् को सारे वेग से दौडकर भी न पा सकता था। तब डाकू अंगुलिमाल को यह हुआ—‘आश्चर्य है जी! अद्भूत है जी!! मैं पहिले दौडते हुये हाथी को भी पीछा करके पकड लेता था, ॰ घोडे को भी ॰, ॰ रथ को भी ॰, ॰ मृग को भी पीछा करके पकड लेता था। किन्तु, मामूली चाल से चलते इस श्रमण को, सारे वेग से दौडकर भी नहीं पा सकता हूँ।’ खडा होकर भगवान् से बोला—
“खडा रह, श्रमण!”
“मैं स्थित (=खडा) हूँ अंगुलिमाल! तू भी स्थित हो।”
तब डाकू अंगुलिमाल को यह हुआ—‘यह शाक्य-पुत्रीय श्रमण सत्यवादी सत्य-प्रतिज्ञ (हाते हैं); किन्तु यह श्रमण जाते हुय भी ऐसा कहता है—‘मैं स्थित हूँ ॰।’ क्यों न मैं इस श्रमण से पूछँू। तब ॰ अंगुलिमाल ने गाथाओं में भगवान् से कहा—
“श्रमण! जाते हुये ‘स्थित हूँ।’ कहता है, मुझ खडे हुये को अस्थित कहता है।
श्रमण! तुझे यह बात पूछता हूँ ‘कैसे तू स्थित और मैं अ-स्थित हूँ?’।।1।।”
“अंगुलिमाल! सारे प्राणियों के प्रति दंड छोडने से मैं सर्वदा स्थित हूँ।
तू प्राणियों में अ-संयमी है, इसलिये मैं स्थित हूँ, और तू अ-स्थित है।।2।।”
“मुझे महर्षि का पूजन किये देर हुई, यह श्रमण महावन में मिल गया।
सो मैं धर्मयुक्त गाथा को सुनकर चिरकाल के पाल को छोडूँगा”।।3।।
इस प्रकार डाकू ने तलवार और हथियार खोह, प्रपात और नालें फंक दिये।
डाकू ने सुगत के पैरों की वन्दना की, और वहीं उनसे प्रब्रज्या माँगी।।4।।
बुद्ध करूणामय महर्षि, जो देवों सहित लोग के शास्ता (=गुरू) हैं।
उसको ‘आ भिक्षु’ बोले, यही उसका संन्यास हुआ।।5।।
तब भगवान् आयुष्मान् अंगुलिमाल को अनुगामी-श्रमण बना जहाँ श्रावस्ती थी वहाँ, चारिका के लिये चले। क्रमशः चारिका करते जहाँ श्रावस्ती थी, वहाँ पहूँचे। श्रावस्ती में भगवान् अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। उस समय राजा प्रसेनजित् कोसल के अन्तःपुर द्वार पर बडा जन-समूह एकत्रित था। कोलाहल (=उच्च शब्द, महाशब्द) हो रहा था—‘देव! तेरे राज्य में ॰ अंगुलिमाल नामक डाकू है। उसनें ग्रामों को भी अ-ग्राम ॰। वह मनुष्यों को मार कर अंगुलियों की माला पहनता है। देव! उसको रोक।”
तब राजा प्रसेनजित् कोसल पाँच सौ धोउ-सवारों के साथ मध्याह्न को श्रावस्ती से निकल (और) जिधर आराम था, उधर गया। जितनी यान की भूमि थी, उतनी यान से जा, यान से उतर पैदल जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे राजा प्रसेनजित् कोसल से भगवान् ने कहा—
“क्या महाराज! तुझ पर राजा मागध श्रेणिक बिंबसार बिगडा है, या वैशालिक लिच्छवि, या दूसरे विरोधी राजा?”
“भनते! न मुख पर राजा मागध ॰ बिगडा है ॰। भन्ते! मेरे राज्य में ॰ अंगुलिमाल नामक डाकू ॰। भन्ते! मैं उसी को निवारण करने जा रहा हूँ।”
“यदि महाराज! तू अंगुलिमाल को केश-श्मश्रु मुँडा, काषाय-वस्त्र पहिन, घर से बेघर हो प्रब्रजित हुआ, प्राण-हिंसा-विरत, अदत्तादान-विरत, मृषावाद-विरत, एकाहारी, ब्रह्मचारी, शीलवान्, धर्मात्मा देखे, तो उसको क्या करें?”
“हम भन्ते! प्रत्युत्थान करेंगे, आसन के लिये निमंत्रित करेंगे, चीवर, पिंड-पात, शयनासन, ग्लान-प्रत्यय, भैषज्य परिष्कारों से निमंत्रित करेंगे; और उनकी धार्मिक रक्षा=आवरण=गुप्ति करेंगे। किंतु भन्ते! उस दुःशील पापी को ऐसा शील-संयम कहाँ से होगा?”
उस समय आयुष्मान् अंगुलिमाल भगवान् के अ-विदूर बैठे थे। तब भगवान् ने दाहिनी बाँह को पकड कर राजा प्रसेनजित् कोसल से कहा—
“महाराज! यह है अंगुलिमाल।”
तब राजा प्रसेनजित् कोसल को, भय हुआ, स्तब्धता हुई, रोमांच हुआ। तब भगवान् ने राजा प्रसेनजित् कोसल से यह कहा—
“मत डरो, महाराज! मत डरो महाराज! (अब) इससे तुझे भय नहीं है।” तब राजा प्रसेनजित् कोसल को जो भय ॰ था, वह विलीन हो गया।
तब राजा प्रसेनजित् कोसल, जहाँ आयुष्मान् अंगुलिमाल थे, वहाँ गया। जाकर आयुष्मान् अंगुलिमाल से बोला—
“आर्य अंगुलिमाल हैं?”
“हाँ, महाराज।”
“आर्य के पिता किस गोत्र के, और माता किस गोत्र की?”
“महाराज! पिता गाग्र्य, माता मैत्रायणी।”
“आर्य गाग्र्य मैत्रायणी-पुत्र अमि-रमण करें। मैं आर्य ग्राग्य मैत्रायणी-पुत्र की चीवर, पिंड-पात, शयनासन, ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य परिष्कारों से सेवा करूँगा।”
उस समय आयुष्मान् अंगुलिमाल आरण्यक, पिंडपातिक, पांसु-कूलिक, त्रैचीवरिक थे। तब आयुष्मान् अंगुलिमाल ने राजा प्रसेनजित् कोसल से कहा—
“महाराज! मेरे तीनों चीवर पूरे हैं।”
तब राजा प्रसेनजित् कोसल जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठ…भगवान् से यह बोला—
“आश्चर्य भन्ते! अद्भूत भन्ते!! कैसे भन्ते! भगवान् अदान्तों को दमन करते, अशांतो को शमन करते, अ-पिरनिर्वृतों को परिनिर्वाण करते हैं। भन्ते! जिनको हम दंड से भी, शस्त्र से भी दमन न कर सके, उनको भन्ते! भगवान् ने बिना दंड के, बिना शस्त्र के दमन कर दिया। अच्छा, भन्ते! हम जाते हैं, हम बहु-कृत्य=बहु-करणीय (=बहुत काम वाले) हैं।”
“जिसका महाराज! तू काल समझता है (वैसा कर)।”
तब राजा प्रसेनजित् कोसल आसन से उठक्र भगवान् को अभिवादन कर प्रदक्षिणा कर चला गया।
तब आयुष्मान् अंगुलिमाल पूर्वाह्न समय पहिनकर, पात्र-चीवर ले श्रावस्ती में पिंड के लिये प्रविष्ट हुये। श्रावस्ती में बिना ठहरे, पिंड-चार करते आयुष्मान् अंगुलिमाल ने एक स्त्री को मूढ-गर्भा=विघात-गर्भा (=मरे गर्भवाली) देखा। देखकर उनको यह हुआ—‘हा! प्राणी दुःखपा रहे हैं!! हा! प्राणी दुःख पा रहे है।’ तब आयुष्मान् अंगुलिमाल श्रावस्ती में पिंड-चार करके भोजनोपरान्त…जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् अंगुलिमाल ने भगवान् से कहा—
“मैं भन्ते! पूर्वाह्न समय पहिन कर, पात्र-चीवर ले श्रावस्ती में पिंड के लिये प्रविष्ट हुआ। श्रावस्ती में ॰ मैने तो एक स्त्री को मढ-गर्भा ॰ देखा। ‘॰ हा! प्राणी दुःख पा रहे हैं’।”
“तो अंगुलिमाल! जहाँ वह स्त्री है, वहाँ जा। जाकर उस स्त्री से कह — भगिनी! यदि मैं जन्म से, जानकर प्राणि-वध करना नहीं जानता, (तो) उस सत्य से तेरा मंगल हो; गर्भ का मंगल हो।”
“भन्ते! यह तो निश्चय मेरा जान कर झूठ बोलना होगा। भन्ते मैंने जान कर बहुत से प्राणि-वध किये हैं।”
“अंगुलिमाल! तू जहाँ वह स्त्री है वहाँ…जाकर यह कह—‘भगिनी! यदि मैने आर्य जन्म में पैदा हो (कर) जान कर प्राणि-वध करना नहीं जाना, (तो) इस सत्य से ॰।”
“अच्छा भन्ते!”…आयुष्मान् अंगुलिमाल ने …जाकर उस स्त्री से कहा—
“भगिनी! यदि मैंने आर्य जन्म में पैदा हो, जान कर प्राणि-वध ॰।” तब स्त्री का मंगल हो गया, गर्भ का भी मंगल हो गया।
आयुष्मान् अंगुलिमाल एकाकी…अप्रमत्त=उद्योगी संयमी हो विहार करते न-चिर में ही, जिसके लिये कुल-पुत्र…प्रब्रजित होते हैं, उस सर्वोत्तम ब्रह्मचर्य-फल को इसी जन्म में स्वयं जान कर=साक्षात्कार कर=प्राप्त कर विहार करने लगे। ‘जन्म क्षय हो गया, ब्रह्मचर्य-पालन हो चुा, करना था सो कर लिया, अब और करने को यहाँ नहीं हैं’ (इसे) जान लिया। आयुष्मान् अंगुलिमाल अर्हतों में एक हुये।
आयुष्मान् अंगुलिमाल पूर्वाह्न समय पहिन कर, पात्र-चीवर ले, श्रावस्ती में भिक्षा के लिये प्रविष्ट हुये। किसी दूसरे का फेंका ढेला आयुष्मान् के शरीर पर लगा; दूसरे का फेंका डंडा ॰; दूसरे का फेंका कंकड ॰। तब आयुष्मान् अंगुलिमाल बहते-खून, फटे-शिर, टूटे-पात्र, फटी संघाटी के साथ जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। भगवान् ने दूर से ही आयुष्मान् अंगुलिमाल को आते देखा। देखकर आयुष्मान् अंगुलिमाल से कहा—
“ब्राह्मण! तूने कबुल कर लिया। ब्राह्मण! तूने कबूल कर लिया। जिस कर्म-फल के लिये अनेक सौ वर्ष, अनेक हजार वर्ष, नर्क में पचना पडता, उस कर्म-विपाक को ब्राह्मण! तू इसी जन्म में भोग रहा है।”
तब आयुष्मान् अंगुलिमाल ने एकान्त में ध्यानावस्थित हो विमुक्त-सुख को अनुभव करते, उसी समय यह उदान कहा—
“जो पहिले अर्जित कर पीछे, उसे मार्जित करता है।
वह मेघ से मुक्त चन्द्रमा की भाँति इस लोक को प्रभासित करता है।।1।।
जिसका किया पाप-कर्म पुण्य (=कुशल) से ढँका जाता है।
वह मेघ से मुक्त ॰।।2।।
जो संसार में तरूण भिक्षु बुद्ध-शासन में जुटता है। वह ॰।।3।।
दिशायें मेरी धर्म-कथा को सुनें, दिशायें मेरे बुद्ध-शासन में जुडें।
वह संत पुरूष दिशाओं को सेवन करें, जो धर्म के लिये ही प्रेरित करते है।।4।।
दिशायें मेरे क्षांति-वादियों, मैत्री-प्रशंसको के धर्म को;
समय पर सुनें, और उसके अनुसार चलें।।5।।
वह मुझे या दूसरे किसी को भी नहीं मारेगा।
(वह) परम शांति को पाकर स्थावर जंगम की रक्षा करेगा।।6।।
(जैसे) नाली-वाले पानी ले जाते हैं, इषु-कार शर को सीधा करते हैं।
बढई लकडी को सीधा करते हैं, (वैसे ही) पंडित अपने को दमन करते हैं।।7।।
कोई दंड से दमन करते हैं, (कोई) शस्त्र और कोडा से भी।
तथागत-द्वारा बिना दंड, बिना शस्त्र के ही मैं दमन किया गया हूँ।।8।।
पहिले के हिंसक मेरा नाम आज अहिंसक है।
आज मैं यथार्थ-नामवाला हूँ, किसी की हिंसा नहीं करता।।9।।
पहिले मैं अंगुलिमाल नाम से प्रसिद्ध चोर था।
बडी बाढ़ (=महा-ओघ) में डूबते बुद्ध की शरण आया।।10।।
पहिले मैं अंगुलिमाल नाम से प्रसिद्ध खून-रंगे हाथवाला (=लोहित-पाणि) था।
देखो शरणागति को? भव-जाल सिमट गया।।11।।
बहुत दुर्गति में ले जाने वाले कर्मो को करके।
कर्म-विपाक से स्पृष्ट (=लगा) (था) (जिन) से उऋण हो भोजन करता हूँ।।12।
बाल=दुर्बुद्धि जन, प्रमाद (=आलस्य) में लगे रहते हैं।
मेधावी (पुरूष) अ-प्रमाद की, श्रेष्ठ धन की भाँति रक्षा करते हैं।।13।।
मत प्रमाद में जुडो, मत काम-रतिका संग करो।
अप्रमाद-मुक्त हो ध्यान करते (मनुष्य) विपुल सुख को पाता है।।14।।
(यहाँ मेरा आना) स्वागत है, अप-गत (=दुरागत) नहीं,
यह मेरी (मंत्रणा) दुर्मंत्रणा नहीं।
प्रतिमान (=ज्ञान) होने वाले धर्मों में जो श्रेष्ठ है, उस (निर्वाण) को मैंने पा लिया।।15।।
स्वागत है, अपगत नहीं, यह मेरा दुर्मंत्रण नहीं।
तीनों विद्याओं को पा लिया, बुद्ध के शासन को कर लिया।।16।।
टीकाएँ [4]
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