ऐसा मैंने सुना —
एक समय भगवान् साढे़ बारह सौ भिक्षुओं के महाभिक्षु-संघ के साथ, अंगुत्तराप (देश में) चारिका करते हुये, वहाँ पर…आपण नामक निगम (=कस्बा) था, वहाँ पहूँचे।
केणिय जटिल ने सुना—शाक्य-कुल से प्रब्रजित, शाक्य-पुत्र श्रमण गौतम साढे़ बारह सौ भिक्षुओं के महाभिक्षु-संघ के साथ, अंगुत्तराप में चारिका करते हुए, आपण में आये हैं। उन भगवान् गौतम का ऐसा कल्याण कीर्ति-शब्द फैला हुआ हैं ॰। ॰। इस प्रकार के अर्हतों का दर्शन उत्तम होता है।
तब केणिय जटिल जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया, जाकर भगवान् के साथ…संमोदन कर,… (कुशल-प्रश्न पूछ) एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे केणिय जटिल को भगवान् ने धर्म के उपदेश द्वारा संदर्शन, समापदन, समुत्तेजन, संप्रशंसन किया। भगवान् के धर्म-उपदेश-द्वारा संदर्शित…हो, केणिय जटिल ने भगवान् से कहा—
“आप गौतम भिक्षु-संघ-सहित कल का मेरा भोजन स्वीकार करें।”
ऐसा कहने पर भगवान् ने केणिय जटिल से कहा—
“केणिय! भिक्षु-संघ बड़ा है, साढे़ बारह सौ भिक्षु हैं; और तुम ब्राह्मणों में प्रसन्न (=श्रद्धालु) हो।”
दूसरी बार भी केणिय जटिल ने भगवान् से कहा—
“क्या हुआ, भो गौतम! जो बडा भिक्षु-संघ है, साढे बारह सौ भिक्षु है, और मैं ब्राह्मणों में प्रसन्न हूँ? आप गौतम भिक्षु संघ सहित कल का मेरा भोजन स्वीकार करें।”
दूसरी बार भी भगवान् ने केणिय जटिल से यही कहा—॰।
॰ तीसरी बार भी केणिय जटिल ने भगवान् से यही कहा—॰।
भगवान् ने मौन रह स्वीकार किया।
तब केणिय जटिल भगवान् की स्वीकृति को जान, आसन से उठ, जहाँ उसका आश्रम था, वहाँ गया। जाकर मित्र-अमात्य, जाति-बिरादरी वालों से बोला—
“आप सब मेरे मित्र-अमात्य, जाति-बिरादरी सुनें—मैंने भिक्षु-संघ-सहित श्रमण गौतम को कल के भोजन के लिये आमंत्रित किया है, सो आप लोग शरीर से सेवा करें।”
“अच्छा, हो!” केणिय जटिल से, ॰मित्र-अमात्य, जाति-बिरादरी ने कहा। (उनमें से) कोई चूल्हा खोदने लगे, कोई लकडी फाडने लगे, कोई बर्तन धोने लगे, कोई पानी के मटके (=माणिक) रखने लगे, कोई आसन बिछाने लगे। केणिय जटिल् स्वयं पट-मंडप (=मंडल-माल) तैयार करने लगा।
उस समय निघण्टु, कल्प (=केटुम)—अक्षर-प्रभेद सहित तीनों वेद तथा पाँचवें इतिहास में पारंगत, पदक (=कवि), वैयाकरण, लोकायत (शास्त्र) तथा महापुरूष-लक्षण (=सामुद्रिक-शास्त्र) में निपुण (=अनवय), शैल नामक ब्राह्मण आपण में, वास करता था; और तीन सौ विद्यार्थियों (=माणवक) को मंत्र (=वेद) पढाता था। उस समय शैल ब्राह्मण केणिय जटिल में अत्यन्त प्रसन्न (=श्रद्धावान्) था।…। तब (वह) तीन सौ माणवकों के साथ जंघा-विहार (=चहल-कदमी) के लिये टहलता हुआ, जहाँ केणिय जटिल का आश्रम था, वहाँ गया। शैल ब्राह्मण ने देखा कि केणिय जटिल के जटिलों (=जटाधारी, वाणप्रस्थी शिष्यांे) में, कोई चूल्हा खोद रहे हैं ॰, तथा केणिय जटिल स्वयं मंडल-माल तय्यार कर (रहा है)। देखकर (उसने) केणिय जटिल से कहा—
“क्या आप केणिय के यहाँ आवाह होगा, विवाह होगा, या महा-यज्ञ आ पहूँचा है? क्या बल-काय (=सेना)-सहित मगध-राज श्रेणिक बिंबसार, कल के भोजन के लिये निमंत्रित किया गया है?”
“नहीं, शैल! न मेरे यहाँ आवाह होगा, न विवाह होगा, और न बल-काय-सहित मगध-राज श्रेणिक बिंबसार कल के भोजन के लिये निमंत्रित है, बल्कि मेरे यहाँ महायज्ञ है। शाक्य-कुल से प्रब्रजित शाक्य-पुत्र श्रमण गौतम साढे बारह सौ भिक्षुओं के महाभिक्षु-संघ के साथ अंगुत्तराप में चारिका करते, आपण में आये है। उन भगवान् गौतम का ऐसा मंगल कीर्ति-शब्द फैला हुआ है—वह भगवान् अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध, विद्या-आचरण-संपन्न, सुगत, लोकविद्, अनुत्तर (=अनुपम) पुरूषों के चाबुक-सवार, देव-मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध भगवान् हैं। वह भिक्षु-संघ-सहित कल मेरे यहाँ निमंत्रित हुये हैं। ॰।
“हे केणिय! (क्या) ‘बुद्ध’ कह रहे हो?”
“हे शैल! (हाँ) ‘बुद्ध’ कह रहा हूँ।”
“॰ बुद्ध कह रहे हो?”
“॰ बुद्ध कह रहा हूँ।”
“॰ बुद्ध कह रहे हो?”
“॰ बुद्ध कह रहा हूँ।”
तब शैल ब्राह्मण को हुआ—‘बुद्ध’ ऐसा घोष (=आवाज) भी लोक में दुर्लभ है। हमारे मंत्रों मे महापुरूषों के बत्तीस लक्षण आए हुए हैं, जिनसे युक्त महापुरूष दो ही गतियाँ हैं। यदि वह घर में वास करता है, तो चारो छोर तक का राज्य वाला, धार्मिक धर्म-राजा चक्रवर्ती…राजा (होता) है। वह सागर-पर्यन्त इस पृथिवी को बिना दण्ड-शस्त्र से, धर्म से विजय कर शासन करता है। और यदि घर छोड बेघर हो प्रब्रजित होता है, (तो) लोक में आच्छादन-रहित अर्हत् सम्यक्-सम्बुद्ध होता है।”—“हे केणिय! तो फिर कहाँ वह आप गौतम अर्हत सम्यक्-संबुद्ध, इस समय विहार करते हैं?’
ऐसा कहने पर केणिय जटिल ने दाहिनी बाँह पकड कर, शैल ब्राह्मण से यह कहा—
“हे शैल! जहाँ वह नील वन-पाँती है।”
तब शैल तीन सौ माणवकों के साथ जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। तब शैल ब्राह्मण ने उन माणवकों से कहा—
“आप लोग निःशब्द (=अल्प-शब्द) हो, पैर के बाद पैर रखते आवे। सिंहो की भाँति वह भगवान् अकेले विचरने वाले, (और) दुर्लभ होते है। और जब मैं श्रमण गौतम कं साथ संवाद करू, तो आप लोग मेरे बीच में बात न उठावें । आप लोग मेरे (कथन) की समाप्ति तक चुप रहें।”
तब शैल ब्राह्मण जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् के साथ सम्मोदन कर…(=कुशल प्रश्न पूछ)…एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठ शैल ब्राह्मण भगवान् के शरीर में महापुरूषों के बत्तीस लक्षण खोजने लगा। शैल ब्राह्मण ने बत्तीस महापुरूष‘लक्षणों में से दो छोड अधिकांश भगवान् के शरीर मं देख लिये। दो महापुरूष-लक्षणों—झिल्ली से ढँकी पुरूष-गुह्येंद्रिय, और अति-दीर्घ-जिह्वा—के बारे में…सन्देह में था…। तब भगवान् ने इस प्रकार का योग-बल प्रकट किया, जिससे कि शैल ब्राह्मण ने भगवान् के कोप-आच्छादित वस्ति-गुह्य को देखा। फिर भगवान् ने जीभ निकाल कर (उससे) दोनों कानों को श्रोत को छुआ…, सारे ललाट-मंडल को जीभ से ढाँक दिया। तब शैल ब्राह्मण को ऐसा (विचार) हुआ — श्रमण गौतम अ-परिपूर्ण नहीं, परिपुर्ण बत्तीस महापुरूष-लक्षणों से युक्त है। लेकिन यह नहीं सकता—बुद्ध हैं, या नहीं वृद्ध=महल्लक ब्राह्मणों आचार्य-प्रचार्यों को कहते सुना हैं-कि जो अर्हत् सम्यक्-सम्बुद्ध होते हैं, वह अपने गुण कहे जाने पर अपने को प्रकाशित करते है। क्यों न मैं श्रमण गौतम के सम्मुख उपयुक्त गाथाओं से स्तुति करूँ। तब शैल ब्राह्मण भगवान् के सामने उपयुक्त गाथाओं से स्तुति करने लगा—
“परिपूर्ण-काया सुन्दर रूचि (=कांति) वाले, सुजान, चारू-दर्शन,
सुवर्णवर्ण हो भगवान्! सु-शुक्ल-दाँत हो, (और) वीर्यवान्।।1।।
सुजात (=सुन्दर जन्म वाले) पुरूष के जो व्यंजन (=लक्षण) होते हैं,
वह सभी महापुरूष-लक्षण तुम्हारी काया में (हैं)।।2।।
प्रसन्न (=निर्मल)-नेत्र, सुमुख, बड़े सीधे, प्रताप-वान्,
(आप) श्रमण-संघ के बीच में आदित्य की भाँति विराजते हो।।3।।
कल्याण-दर्शन, भो भिक्षु! कंचन-समान शरीर वाले!
ऐसे उत्तम वर्ण वाले तुम्हे श्रमण-भाव (=भिक्षु होने) में क्या (रक्खा) हैं?।।4।।
तुम तो चारों छोर के राज्य वाले, जम्बूद्वीप के स्वामी।
रथर्षम, चक्रवर्ती, राजा हो सकते हो।।5।।
क्षत्रिय भोज-राजा (=मांडलिक-राजा) तुम्हारे अनुयायी होंगे।
भो गौतम! राजाधिराज मनुजेन्द्र हो, राज्य करों।।6।।”
(भगवान्—)“शैल! मैं राजा हूँ; अनुपम धर्मराजा।
मैं न पलटने वाला चक्र धर्म के साथ चला रहा हूँ।।7।।”
(शैलब्राह्मण—) “अनुपम धर्म-राजा संबुद्ध (अपने को) कहते हो?
भो गौतम! ‘धर्म से चक्र चला रहा हूँ’ कह रहे हो।।8।।
कौन सा आप शास्ता का दन्तप (=नाग) श्रावक सेनापति है?
कौन स चलाये धर्म-चक्र को अनु-चालन कर रहा है।।9।।
(भगवान्—)“शैल! मेरे द्वारा संचालित चक्र, अनुपम धर्म-चक्र को।
तथागत को अनुजात (=पीछे उत्पन्न) सारिपुत्त अनुचालित कर रहा है।।10।।
ज्ञातव्य को जान लिय, भवनीय की भावना कर ली।
परित्याज्य को छोड दिया, अतः हे ब्राह्मण! मैं बुद्ध हूँ।।11।।
ब्राह्मण! मेरे विषय में संशय को हटाओं, छोडो।
बार बार संबुद्धों का दर्शन दुर्लभ है।।12।।
लोक में जिसका बार बार प्रादुर्भाव दुर्लभ हैं,
वह मैं (राग आदि) शल्य का छेदने वाला अनुपम, संबुद्ध हूँ।।13।।
ब्रह्म-भूत तुलना-रहित, मार (=रागादि शत्रु)-सेना का प्रमर्दक,
(मुझे) देखकर कौन न संतुष्ट होगा, चाहे वह कृष्ण-अभिजातिक क्यों न हो।।14।।”
(शैल—) “जो मुझे चाहता है, (वह मेरे) पीछे आवे, जो नहीं चाहता, वह जावे।
(मैं) यहाँ उत्तर-प्रज्ञावाले (बुद्ध) के पास प्रब्रजित होऊँगा।।15।।”
(शैल के शिष्य) “यदि आपको वह सम्यक्-संबुद्ध का शासन (=धर्म) रूचता है।
(तो) हम भी वर-प्रज्ञ के पास प्रब्रजित होंगे।।16।।
यह जितने तीन सौ ब्राह्मण हाथ-जोडे हैं।
(वह) सभी भगवन्! तुम्हारे पास ब्रह्मचर्य चरण करेंगे।।17।।
(भगवान्—)“शैल! (यह) सांदृष्टिक अकालिक स्वाख्यात ब्रह्मचर्य है।
जहाँ प्रमाद-शून्य सीखने वाले की प्रब्रज्या अ-मोघ है।18।।”
शैल ब्राह्मण ने परिषद्-सहित भगवान् के पास प्रब्रज्या और उपसंपदा पाई।
तब केणिय जटिल ने उस रात की बीतने पर, अपने आश्रम में उत्तम खाद्य-भोज्य तैयार करा, भगवान् को काल सूचना दिलवाई…। तब भगवान् पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र-चीवर ले, जहाँ केणिय जटिल का आश्रम था, वहाँ गये। जाकर बिछे आसन पर भिक्षु-संघ के साथ बैठे। तब केणिय जटिल ने बुद्ध-प्रमुख भिक्षु-संघ को अपने हाथ से, सतर्पित किया, पूर्ण किया। केणिय जटिल भगवान् के भोजन कर, पात्र से हाथ हटा लेने पर एक नीचा आसन ले, एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुये केणिय जटिल को भगवान् ने इन गाथाओं से (दान) अनुमोदन किया—
“यज्ञों में मुख अग्नि-होत्र हैं, छन्दों में मुख (=मुख्य) सावित्री है।
मनुष्यों में मुख राजा है, नदियो में मुख सागर है।।1।।
नक्षत्रों में मुख चन्द्रमा है, तपने वालों में सुख आदित्य है।
भगवान् कणिय जटिल को इन गाथाओं से अनुमोदित कर आसन से उठकर चल दिये।
तब आयुष्मान् शैल परिषद्-सहित एकान्त में प्रमाद-रहित, उद्योग-युक्त, आत्म-निग्रही हो विहरते अचिर में ही, जिसके लिये कुल-पुत्र घर से बेघर हो प्रब्रजित होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य के अन्त (=निर्वाण) को, इसी जन्म में स्वयं जानकर, साक्षात्का, प्राप्त कर, विहरने लगे। ‘जन्म क्षय हो गया, ब्रह्मचर्य-वास पूरा हो गया। करणीय कर लिया गया, और यहाँ कुछ करना नहीं’—यह जान गये। परिषद्-सहित आयुष्मान् शैल अर्हत् हुये।
तब आयुष्मान् शैल ने शास्ता (=बुद्ध) के पास जाकर, चीवनर को (दक्षिण कंधा नंगा रख) एक कंधे पर (रख), जिधर से भगवान् थे, उधर अंजलि जोड, भगवान् से गाथाओं में कहा—
“भो चक्षु-मान्! जो मैं आज से आठ दिन पूर्व तुम्हारी शरण आया।
भो भगवान्! तुम्हारे शासन में सात ही रात मैं दांत हो गया।।।1।।
तुम्हीं बुद्ध हो, तुम्ही शास्ता हो, तुम्हीं मार-विजयी मुनि हो।
तुम (राग आदि) अनुशयों को छिन्नकर, (स्वयं) उत्तीर्ण हो, इस प्रजा को तारते हो।।2।।
उपधि तुम्हारी हट गई, आस्रव तुम्हारे विदारित हो गये।
सिंह-समान, भव (सागर) की भीषणता से रहित, तुम उपादान-रहित हो।।3।।
यह तीन सौ भिक्षु हाथ जोडे खडे हैं।
हे वीर! पाद प्रसारित करो, (यह) नाग (=पाप-रहित) शास्ता की वंदना करें।।4।।
टीकाएँ [4]
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