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अनुवाद [30]

चंकिसुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना —

एक समय महा-भिक्षुसंघ के साथ भगवान् कोसल में चारिका करते जहाँ ओपसाद नामक कोसलों का ब्राह्मण-ग्राम था वहाँ पहूँचे। वहाँ भगवान् ओपसाद से उत्तर देववन (नामक) शाल-वन में विहार करते थे।

उस समय चंकि ब्राह्मण, जनाकीर्ण, तृण-काष्ठ-उदक-धान्य-सम्पन्न, राजभोग्य, राजा प्रसेनजित् कोसल द्वारा प्रदत्त, राज-दायज, ब्रह्मदेव, ओपसाद का स्वामी हो, वास करता था।

ओपसादवासी ब्राह्मणों ने सुना—शाक्य-कुल से प्रब्रजित शाक्य-पुत्र श्रमण गौतम कोसल में चारिका करते, महा-भिक्षु-संघ के साथ ओपसाद में पहुँचे हैं, और ओपसाद में, ओपसाद से उत्तर देववन शाल-वन में विहार करते हैं। उन भगवान् गौतम का ऐसा मंगल कीर्तिशब्द उठा हुआ है ॰ परिशुद्ध ब्रह्मचर्य प्रकाशित करते हैं, इस प्रकार के अर्हतों का दर्शन अच्छा होता है।

तब ओपसाद-वासी ब्राह्मण-गृहस्थि ओपसाद से निकलकर, झुण्ड के झुण्ड उत्तर मुँह की ओर जहाँ देववन शालवन था, उधर जाने लगे। उस समय चंकि ब्राह्मण, दिन के शयन के लिये प्रासाद के ऊपर गया हुआ थां चंकि ब्राह्मण ने देखा कि ओपसाद-वासी ब्राह्मण-गृहस्थ उत्तर मुँह की ओर ॰ उधर जा रहे है। देखकर क्षत्ता (=महामात्य) को संबोधित किया—

“क्या है, हे क्षत्ता! (कि) ओपसाद-वासी ब्राह्मण-गृहस्थ ॰ जहाँ देववन शाल-वन है, उधर जा रहे हैं?”

“हे चंकि! शाक्य कुल से प्रब्रजित शाक्य-पुत्र, श्रमण गौतम कोसल में चारिका करते महाभिक्षु-संघ के साथ ॰ देववन शालवन में विहार कर रहे है। उन भगवान् गौतम का ऐसा मंगलकीर्ति शब्द उठा हुआ है ॰। उन्हीं भगवान् गौतम के दर्शन के लिये जा रहे हैं।”

“तो क्षता! जहाँ ओपसाद ब्राह्मण-गृहपति हैं, वहाँ जाओ। जाकर ओपसादक ब्राह्मण गृहपतियों से ऐसा कहो,—चंकि ब्राह्मण ऐसा कह रहा है—‘थोडी देर आप सब ठहरें, चंकि ब्राह्मण भी श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जायेगा’।”

चंकि ब्राह्मण से “अच्छा भो!” कह, वह क्षत्ता जहाँ ओपसादक ब्राह्मण थे वहाँ गया। जाकर ॰ बोला—

“चंकि ब्राह्मण ऐसा कह रहा है—‘थोडी देर आप सब ठहरें, चंकि ब्राह्मण भी श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जायेगा’।”

उस समय नाना देशों के पाँच सौ ब्राह्मण किसी काम से ओपसाद में वास करते थे। उन ब्राह्मणों ने सुना कि चंकि ब्राह्मण श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जाने वाला है। तब वह ब्राह्मण जहाँ चंकि ब्राह्मण था, वहाँ गये। जाकर चंकि ब्राह्मण से बोले—

“सचमुच आप चंकि श्रमण गौतम के दर्शनार्थ आने वाले है?”

“हाँ भो! मुझे यह हो रहा है, मैं भी श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जाऊँ।”

“आप चंकि! गौतम के दर्शनार्थ मत जायें। आपका श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जाना उचित नहीं है। श्रमण गौतम को ही आप चंकि के दर्शनार्थ आना योग्य है। आप चंकि दोनों ओर से सुजात (=कुलीन) हैं, माता से भी, पिता से भी; पितामह-युगत की सात पीढियों तक, जाति-वाद से अक्षिप्त=अन्-उपक्लिष्ट (=अ-निन्दित) हैं। जो आप चंकि दोनों ओर से सुजात हैं ॰; इस कारण से भी आप चंकि श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जाने के योग्य नहीं है। श्रमण गौतम ही आप चंकि के दर्शनार्थ आने योग्य है। आप चंकि आढ्य, महाधनी, महाभोगवाले हैं; इस अंग से भी ॰। आप चंकि ॰ तीनों बेढों के पारंगत ॰। आप चंकि अभिरूप=दर्शनीय=प्रासादिक, परम-वर्ण-सुन्दरता से युक्त, ब्रह्मवर्ण वाले, ब्रह्मवर्चस्वी, दर्शन के लिये अल्प भी अवकाश न रखने वाले ॰। आप चंकि शीलवान् वृद्धशीली (=बढी हुई शीलवाले) वृद्धशील से युक्त हैं ॰। आप चंकि कल्याण-वचन बोलने वाले =कल्याण-वाककरण=पौर (=नागरिक, सम्य) वाणी से युक्त ॰ आप चंकि बहुतों के आचार्य-प्रचार्य हैं, तीन सौ माणवकों को मंत्र पढाते हैं ॰। आप चंकि राजा प्रसेनजित् कोसल से सत्कृत=गुरूकृत=मानित, पूजित=अपचित हैं। आप चंकि पौष्करसाति ब्राह्मण से ॰ है। आप चंकि ॰ ओपसाद के स्वामी हो बसते है। इस अंग से भी आप चंकि श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जाने योग्य नहीं है। श्रमण गौतम ही आप चंकि के दर्शनार्थ आने योग्य है।”

“तो भो! मेरी भी सुनो—(कैसे) हमी श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जाने योग्य हैं, वह आप श्रमण गौतम हमारे दर्शनार्थ आने योग्य नहीं है। भो! श्रमण गौतम दोनों ओर से सुजात हैं ॰; इस अंग से भी हमी श्रमण गौतम के दर्शनार्थ जाने योग्य है, आप श्रमण गौतम हामरे दर्शनार्थ आने योग्य नहीं है। श्रमण गौतम बहुत सा भूमिस्थ और आकाशस्थ हिरण्य सुवर्ण छोडकर, प्रब्रजित हुये हैं ॰। श्रमण गौतम बहुत काले केशवाले, भद्र यौवन से संयुक्त, अतितरूण, प्रथम वयस में ही घर से बेघर हो, प्रब्रजित हुये ॰। श्रमण गौतम माता-पिता को अनिच्छुक अश्रुमुख रोते हुये, (छोड), शिर-दाढी मुँडाकर, काषाय-वस्त्र पहिन, घर से बेघर हो प्रब्रजित हुये ॰। श्रमण गौतम अभिरूप=दर्शनीय ॰ ब्रह्मवर्चस्वी, दर्शन के लिये अल्प भी अवकाश न रखने वाले ॰। श्रमण गौतम शीलवान् ॰। श्रमण गौतम कल्याण-वचन बोलने वाले ॰। श्रमण गौतम बहुतों के आचार्य-प्राचार्य है ॰। ॰ काम-राग-विहीन ॰। प्रपंच-रहित ॰। श्रमण गौतम कर्मवारी, क्रियावादी, ब्राह्मण-संतान के निष्पाप अग्रणी है ॰। श्रमण गौतम अदीन-क्षत्रिय-कुल, उच्च-कुल से प्रब्रजित हुये ॰। ॰ महाधनी, महोभोगवान् आढ्य-कुल से प्रब्रजित हुये ॰। श्रमण गौतम को देश के बाहर से, राष्ट्र के बाहर से भी (लोग) पूछने को आते हैं ॰। श्रमण गौतम की अनेक सहस्र देवता (अपने) प्राणों से शरणागत हुये हैं ॰। श्रमण गौतम का ऐा मंगल कीर्ति-शब्द उठा हुआ है ॰। ॰। श्रमण गौतम बत्तीस महापुरूष-लक्षणों से युक्त हैं ॰। श्रमण गौतम की राजा मागध श्रेणिक बिम्बसार पुत्र-दार-सहित…ब्राह्मण पौष्कर-साहित ॰। ॰। श्रमण गौतम भो! ओपसाद में प्राप्त हुये हैं, ओपसाद में ॰ देववन शालवन में विहार कर रहे हैं। जो कोई श्रमण या ब्राह्मण हमारे गाँव-खेत में आते हैं, वह अतिथि होते हैं अतिथि सत्करणीय=गुरूकरणीय=माननीय=पूजनीय है। चूँकि भो! श्रमण गौतम ओपसाद में प्राप्त हुये ॰। (अतः) हमारे अतिथि हैं।

श्रमण गौतम अतिथि हो हमारे सत्करणीय ॰। इस अंग से भी। इतना ही भो! मैं उन आप गौतम का गुण कहता हूँ, लेकिन वह आप गौतम इतने ही गुणवाले नहीं हैं वह आप गौतम परिमाण-गुणवाले हे। एक एक अंग से भी युक्त होने पर, आप श्रमण गौतम हमारे दर्शन करने के लिये आने योग्य नहीं हैं, बल्कि हमीं उन आप गौतम के दर्शनार्थ जाने योग्य है। इसलिये हम सभी श्रमण गौतम के दर्शनार्थ चलें।”

तब चंकि ब्राह्मण महान् ब्राह्मणों के गण के साथ जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ…संमोदन कर…एक ओर बैठ गया।…उस समय भगवान् वृद्ध मृद्ध ब्राह्मणों के साथ कुछ (बात करते) बैठे हुये थे।

उस समय कापथिक नामक तरूण, मुण्डित-शिर, जन्म से सोलह वर्ष का,…तीनों वेदों का पारंगत माणवक परिषद् में बैठा था। वह बुढें बुढे ब्राह्मणों के भगवान् के साथ बातचीत करने के समय, बीच बीच में बोल उठता था। तब भगवान् ने कापथिक माणवक को मना किया।

“आयुष्मान् भारद्वाज! बूढे बूढे ब्राह्मणों के बात करने में बात मत डालो। आयुष्मान् भारद्वाज! कथा समाप्त होने दो!”

(भगवान् के) ऐसा कहने पर चंकि ब्राह्मण ने भगवान् से कहा—

“आप गौतम कापथिक माणवक्को मत रोकें; कापथिक माणवक कुल-पुत्र (=कुलीन) हैं ॰, बहुश्रुत है ॰, सुवक्ता ॰, पंडित ॰। कापथिक माणवक आप गौतम के साथ इस बात में बात कर सकता है।”

तब भगवान् को हुआ — अवश्य कापथिक माणवक की कथा त्रिवेद-प्रवचन (=वेदाध्ययन) सम्बन्धी होगी, जिससे कि ब्राह्मण इसे आगे कर रहे हैं। उस समय कापथिक माणवक को (विचार) हुआ—‘जब श्रमण गौतम मेरी आँख की ओर आँख लायेगा, तब मैं श्रमण गौतम से प्रश्न पूछूँगा’। तब भगवान् ने (अपने) चित्त से कापथिक माणवक के चित्त-वितर्क को जानकर, जिधर कापथिक माणवक थ, उधर (अपनी) आँख फेरी। तब कापथिक माणवक को हुआ—‘श्रमण गौतम मुझे देख रहा हे, क्यों न मैं श्रमण गौतम से प्रश्न पूछूँ?’ तब कापथिक माणवक ने भगवान् से कहा—

“भो गौतम! जो यह ब्राह्मणों का पुराना मंत्रपद (=वेद) इस परम्परा से, … (=वचन समूह)-सम्प्रदाय से है। उसमें ब्राह्मण पूर्ण रूप से निष्ठा (=श्रद्धा) रखते हैं—‘यही सत्य है, और सब झूठा’। इस विषय में आप गौतम क्या कहते हैं?”

“क्या भारद्वाज! ब्राह्मणों में एक भी ब्राह्मण है, जो कहे—मैं इसे जानता हूँ, इसे देखता हूत्र, यही सच हैं, और झूठ है?”

“नहीं, हे गौतम!”

“क्या भारद्वाज! ब्राह्मणों का एक आचार्य भी ॰, एक आचार्य-प्राचार्य भी, … की सात पीढी तक भी ॰। ब्राह्मणों के पूर्वज ऋषि, ॰ अदृक, वामक ॰, उन्होंने भी क्या कहा—‘हम इसको जानत हैं, हम इसको देखते हैं, यही सच है और झूठ है?”

“नहीं, हे गौतम!”

“इस प्रकार भारद्वाज! ब्राह्मणों में एक भी ब्राह्मण नहीं है, जो कहे ॰। ॰। जैसे भारद्वाज! अंध-वेण-परंपा (=अंधों की लकडी का ताँता) लगी हो, पहिलेवाला भी नहीं देखता, बीच का भी नहीं देखता, पिछला भी नहीं देखता। ऐसे ही भारद्वाज! ब्राह्मणों का कथन अंध-वेण (=अंधे की लकडी) के समान हैं, पहिलेवाला भी नहीं देखता, बीच का भी नहीं देखता, पिछला भी नहीं देखता। तो क्या मानते हो, भारद्वाज! क्या ऐसा होने पर ब्राह्मणों की श्रद्धा अ-मूलक नहीं हो जाती ?”

“हे गौतम! नहीं, ब्राह्मण श्रद्धा ही की उपासना नहीं करते, अनुश्रव (=श्रुति) की भी उपासना करते हैं।”

“पहिले भारद्वाज! तू श्रद्धा (=निष्ठ) पर पहुँचा था, अब अनुश्रव कहता है। भारद्वाज! यह पाँच धर्म इसी जन्म में दो प्रकार के विपाक (=फल) देने वाले हैं। कौन से पाँच? (1) श्रद्धा, (2) रूचि, (3) अनुश्रव, (4) आकार-परिवितर्क, (5) दृष्टि-निध्यानाक्ष (=दिट्ठिनिज्झानक्ख)। भारद्वाज! यह पाँ धर्म इसी जन्म में दो प्रकार के विपाक देने वाले हैं। भारद्वाज! सुन्दर-तौर से श्रद्धा किया भी रिक्त=तुच्छ और मृषा हो सकता है, सुश्रद्धा न किया भी यथार्थ=तथ्य=अन्-अन्यथा हो सकता है। सुरूचि किया भी ॰। सु-अनुश्रुत किया भी ॰। सु-परिवितर्क किया भी। सु-निध्यान किया भी ॰ रिक्त=तुच्छ और मृषा हो सकता है। सु-निध्यान न किया भी यथार्थ=तथ्य=अनन्यथा हो सकता है। भारद्वाज! सत्यानुरक्षक विज्ञ पुरूष को यहाँ एकांश से (=सेालहो आना) निष्ठा करना योग्य नहीं है, कि—‘यही सत्य है, और बाकी मिथ्या है।”

“हे गौत! सत्यानुरक्षा (=सत्य की रक्षा) कैसे होती है? सत्य का अनुरक्षण कैसे किया जाता है, हम आप गौतम से सत्यानुरक्षण पूछते हैं?”

“भारद्वाज! पुरूष को यदि श्रद्धा होती हैं ‘यह मेरी श्रद्धा है-, कहते सत्य की अनुरक्षा करता है। किन्तु यहाँ एकांश से निष्ठा नहीं करता—‘यही सत्य है और (सब) झूठा।’ भारद्वाज! यदि पुरूष को रूचि होती है। ‘यह मेरी रूचि है’ कहते सत्य की अनुरक्षा करता है। किंतु यहाँ एकांश से निष्ठा नहीं करता—‘यदि सत्य है, और झूठा।’

“भारद्वाज! यदि पुरूष को अनुश्रव होता है। ‘यह मेरा अनुश्रव है’ कहते सत्य की अनुरक्षा करता है। किंतु यहाँ एकांश से निष्ठा नहीं करता—‘यही सत्य है, और झूठा।’ भारद्वाज! यदि पुरूष को आकार-परिवितर्क होता है। ‘यह मेरा आकार-वितर्क है’ कहते सत्य की अनुरक्षा करता है; किन्तु यहाँ एकांश से निष्ठा नहीं करता—‘यही सत्य है, और झूठ।’ भारद्वाज! यदि पुरूष को दृष्टि-निध्यायनाक्ष होता है; ‘यह मेरा दृष्टि-निध्यायनाक्ष’, कहते सत्य की अनुरक्षा करता है। किन्तु यहाँ एकांश से निष्ठा नहीं करता ‘यही सत्य है और झूठा। इतने से भारद्वाज सत्य-अनुरक्षण होता है। इतने से सत्य की अनुरक्षा की जाती है। इतने से हम सत्य का अनुरक्षण (=रक्षण) प्रज्ञापित करते हैं; किन्तु (इतने से) सत्य का अनुबोध (=बोध) नहीं होता।”

“भो गौतम! इतने से सत्यानुरक्षण होता है, इनते से सत्य की अनुरक्षा की जाती है; इतने से सत्य का रक्षण हम भी देखते हैं। हे गौतम! सत्य का बोध कितने से होता है, कितने से (नर) सच बूझता है? भो गौतम! हम इसे आपसे पूछते हैं।”

“भारद्वाज! भिक्षु किसी ग्राम या निगम को आश्रय कर विहरता है। (कोई) गृहपति (=गृहस्थ) या गृहपति-पुत्र जाकर लोभ, द्वेष, मोह (इन) तीन धर्मो के विषय में उसकी परीक्षा करता है—‘क्या इस आयुष्मान् को वैसा लोभनीय धर्म (=बात) हैं, जिस प्रकार के लोभ-सम्बन्धी धर्म के कारण न जानते ‘जानता हूँ’ कहें; न देखते ‘देखता हूँ’ कहे। या वैसा उपदेश करे, जो दूसरों के लिये दीर्घकाल तक अहित और दुःख के लिये हो। इन आयुष्मान् का काय-समाचार (=कायिक-आचरण) (और) वचन-समाचार (वाचिक-आचरण) वैसा है, जैसा कि अलोमीका। (या) यह आयुष्मान् जिस धर्म का उपदेश करते हैं (क्या) वह धर्म गंभीर, दुर्दृश=दुर्बोध, शांत, प्रणीत (=उत्तम), अतर्कावचर (=तर्क से अप्राप्य) निपुण=पंडित वेदनीय है? वह धर्म लोभी-द्वारा उपदेश करना सुगम (तो) नहीं है?’

“जब खोजते हुये लोभ-सम्बन्धी धर्मो से (उसे) विशुद्ध पाता है। तब आगे द्वेष-सम्बन्धी धर्मो के विषय में उसकी परीक्षा करता है—‘क्या इस आयुष्मान् को वैसा द्वेष-सम्बन्धी धर्म है ॰; वह धर्म, द्वेषी द्वारा उपदेश करना (तो) सुगम नहीं?”

“जब परीक्षा करते हुये, द्वेष-सम्बन्धी धर्मो से उसे विशुद्ध पाता है। तब आगे मोह-सम्बन्धी धर्मो के विषय में उसको टटोलता है—‘क्या इस आयुष्मान् को वैसा मोह-सम्बन्धी धर्म तो है ॰, वह धर्म ॰, मोही (=मूढ) द्वारा उपदेश करना सुगम (तो) नहीं?

“जब टटोलते हुये उसे लोभनीय, द्वेषनीय, मोहनीय धर्मो से विशुद्ध पाता है; तब उसमें श्रद्धा स्थापित करता है। श्रद्धावान् हो पास जाता है, पास जा के परि-उपासन (=सेवन) करता है। पर्युपासना करके कान लगाता है, कान लगा के धर्म सुनता है। सनुकर धर्म को धारण करता है। धारण किये हुये धर्मो के अर्थ की परीक्षा करता है। अर्थ की परीक्षा करके धर्म ध्यान करने लायक होते हे। धर्म के निध्यान (ध्यान) योग्य होने से स्मृति रूचि (=छन्द) उत्पन्न होती है। छन्दवाला (=रूचिवाला) उत्साह (=प्रयत्न) करता है। उत्साह करते उत्थान (=तोलन) करता है। तोलन करते पराक्रम (=पदहन) करता है। पराक्रमी हो, इसी काया में ही परम-सत्य का साक्षात्कार (=दर्शन) करता है, प्रज्ञा से उसे बेधकर देखता है। इतने से भारद्वाज! सत्य-बोध होता है, इतने से सच बूझता है। इतने से हम सत्य-अनुबोध बतलाते हैं, किन्तु (इतने ही से) सत्य-अनुपत्ति नहीं होती।’

“हे गौतम! इतने से सत्यानुबोध होता हैं, इतने से सच बूझता है, इतने से हम भी सत्यबोध को देखते हैं। परन्तु हे गौतम! सत्य-अनुपत्ति कितने से होती है, कितने से सच को पाता है, हम आप गौतम से सत्यानुपत्ति (=सत्य-प्राप्ति) पूछते हैं?”

“भारद्वाज! उन्ही के धर्मो के सेवने, भावना करने, बढाने से सत्य-प्राप्ति होती है। इतने से भारद्वाज सत्य-प्राप्ति होती हैं, सच को पाता है, इतने से हम सत्य-प्राप्ति बतलाते हैं।”

“इतने से हे गौतम! सत्य-प्राप्ति होती है ॰ हम भी इतने से सत्य-प्राप्ति देखते हैं। हे गौतम! सत्य-प्राप्ति का कौन धर्म अधिक उपकारी (=बहुकार) हैं, सत्य-प्राप्ति के लिये अधिक उपकारी धर्म को हम औप गौतम से पूछते हैं।”

“भारद्वाज! सत्य-प्रात्पि का बहुकारी धर्म ‘प्रधान’ है। यदि प्रधान (=प्रयत्न) न करे, तो सत्य को (भी) प्राप्त न करें। चूँकि ‘प्रधान’ करता है, इसीलिये सच को पाता हैं, इसलिये सत्य-प्राप्ति के लिये बहुारी धर्म ‘प्रधान’ है।”

“प्रधान के लिये है गौतम! कौन धर्म बहुकारी है। प्रधान के बहुकारी धर्म को हम आप गौतम से पूछते हैं?”

“भारद्वाज! प्रधान का बहुकारी उत्थान है, यदि उत्थान (=उद्योग) न करे, तो प्रधान नहीं कर सकता। चूँकि उत्थान करता है, इसलिये प्रधान करता है। इसलिये उत्थान प्रधान का बहुकारी है।”

“॰। ॰ उत्साह उत्थान (=तुलना) का बहुकारी।” ”॰। ॰ छन्द उत्साह का ॰।” ” ॰। ॰ धम्म-निज्झानक्ख (=धर्म-निध्यानाक्ष) छन्द का ॰।” “अर्थ-उपपरीक्षा (=अर्थ का परीक्षण) धर्म-निध्यानाक्षका ॰।” ”॰। ॰ धर्म-धारणा ॰।” “धर्म-श्रवण ॰।” ”॰। ॰ कान लगाना (=श्रोत्र-अवधान) ॰।” ”॰। ॰ पास जाना ॰।” ”॰। ॰ श्रद्धा ॰।”

“सत्य-अनुरक्षण को हमने आप गौतम से पूछा। आप गौतम ने सत्यानुरक्षण हमें बतलाया, वह में रूचता भी है,=खमता भी है। उससे हम सन्तुष्ट हैं। सत्य-अनुबोध (=सच को बूझना) को हमने आप गौतम से पूछा। ॰। सत्य-प्राप्ति ॰। ॰। सत्य-प्राप्ति के बहुकारी धर्म को हमने आप गौतम से पूछा। सत्य-प्राप्ति के बहुकारी धर्म को आप गौतम ने बतलाया। वह हमें रूचता भी है=खमता भी है। उससे हम सन्तुष्ट हैं। जिस जिस को हमने आप गौतम से पूछा, उस उसी को आप गौतम ने (हमें) बतलाया। और वह हमको रूचता भी है=खमता भी है। उससे हम सन्तुष्ट हैं।

“हे गौतम! पहिले हम ऐसा जानते थे, कहाँ इम्य (=नीच), काले, ब्रह्मा के पैर से उत्पन्न (=शूद्र), मुडक-श्रमण, और कहाँ धर्म का जानना। आप गौतम ने मुझमें…श्रमण-प्रेम=श्रमण-प्रसाद ॰। आज से आप गौतम मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक धारण करें।”

टीकाएँ [4]