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अनुवाद [27]

धानंजानि-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना —

एक समय भगवान् राजगृह में वेणुवन कलंदक-निवाप में विहार करते थे।

उस समय आयुष्मान् सारिपुत्त बडे भिक्षु-संघ के साथ दक्षिणागिरि में चारिका कर रहे थे। तब कोई भिक्षु राजगृह में वर्षावास कर, जहाँ दक्षिणागिरि था, जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्त थे, वहाँ गया। जाकर आयुष्मान् सारिपुत्त के साथ…संमोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे उस भिक्षु से आयुष्मान् सारिपुत्त ने यह कहा—

“आवुस! भगवान् निरोग हैं न, बलवान् हैं न?”

“आवुस! भगवान् निरोग हैं, बलवान् हैं?”

“आवुस! भिक्षु-संघ निरोग हैं न, बलवान् हैं न?”

“आवुस! भिक्षु-संघ निरोग हैं, बलवान् हैं?”

“आवुस! वहाँ तण्डुलपल्ल द्वार में धानंजानि नामक ब्राह्मण रहता है। आवुस! धानंजानि ब्राह्मण निरोग है न, बलवान् है न?”

“आवुस! धानंजानि ब्राह्मण निरोग है बलवान् (=तगडा) है।”

“आवुस! धानंजानि ब्राह्मण अ-प्रमत्त (=प्रमाद-रहित) है न?”

“आवुस! धानंजानि ब्राह्मण को अप्रमाद कहाँ से। आवुस! धानंजानि ब्राह्मण राजा का सहारा ले, ब्राह्मण गृहस्थों को लूटता है (=विलुम्पति), ब्राह्मण-गृहपतियों का सहारा ले राजा को लूटता है। जो श्रद्धालु कुल से लाई उसकी श्रद्धालु भार्या थी, वह भी मर गई। अश्रद्धालु कुल से दूसरी भर्या (अब) लाया है।”

“आवुस! दुःश्रुत (=न सुनने योग्य) हमने सुना! दुःश्रुत हमने सुना!! जो कि हमने धानंजाति ब्राह्मण को प्रमत्त सुना। क्या कभी किसी समय धानंजानि ब्राह्मण के साथ हमारा समागम होगा! क्या हमारा उसके साथ कुछ कथा-संलाप होगा!!”

तब आयुष्मान् सारिपुत्त दक्षिणागिरि में इच्छानुसार विहार कर जहाँ राजगृह था, उधर चारिका के लिये चल पडे। क्रमशः चारिका करते, जहाँ राजगृह है, वहाँ पहूँचे। वहाँ राजगृह में आयुष्मान् सारिपुत्त वेणुवन कलंदक-निवाप में विहार करते थे।

तब आयुष्मान् सारिपुत्त पूर्वाह्न समय पहिनकर, पात्रचीवर ले राजगृह में भिक्षा के लिये प्रविष्ट हुये। उस समय धानंजानि ब्राह्मण नगर के बाहर गोष्ठ (=यथान) में गायें दुहा रहा था। तब आयुष्मान् सारिपुत्त राजगृह में पिंडचार कर, भोजनान्तर पिंडपात से छुट्टी पा जहाँ धानंजानि ब्राह्मण था, वहाँ गये। धानंजानि ब्राह्मण ने दूर से ही आयुष्मान् सारिपुत्त को आते देखा। देखकर जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्त थे, वहाँ गया; जाकर आयुष्मान् सारिपुत्त से यह बोला—

“भो सारिपुत्त! यह दूध है इसे पियें, तब तक भोजन का समय होता है।”

“अलम् (=वस) ब्राह्मण! आज मैं भोजन-कृत्य समाप्त कर चुका हूँ। अमुक वृक्ष के नीचे मेरा दिन का विहार होगा; वहाँ आना।”

“अच्छा, भो!”—(कह) धानंजानि ब्राह्मण ने आयुष्मान् सारिपुत्त को उत्तर दिया।

तब धानंजानि ब्राह्मण प्रातराश कर, भोजनोपरांत जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्त थे, वहाँ गया; जाकर आयुष्मान् सारिपुत्त के सथ…सम्मोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे धानंजानि ब्राह्मण से आयुष्मान् सारिपुत्त ने यह कहा—

“धानंजानि! अ-प्रमत्त (=दुष्कर्म में प्रमादी सुकर्म में रत) तो हो?”

“भो सारिपुत्त! कहाँ से हम जैसो को अ-प्रमाद होगा, जिन्हें कि माता-पिता को पोषण करना हो, पुत्र-दारा को पोषण करना हो, दास-कर्मकरो को पोषण करना हो; मित्र-अमात्यों का काम करना हो, जाति-भाइयों (=ज्ञाति-सलोहित) का काम करना हो, अतिथियों का ॰, पूर्व-प्रेतों (=पितरों) का ॰, देवताओं का ॰, राजा का राज-कार्य करना हो, और इस (अपने) शरीर को भी पर्तित बर्द्धित करना हो?”

“तो क्या मानते हो, धानंजानि! यहाँ कोई (पुरूष) माता-पिता के लिये अ-धर्मचारी=विषम-धारी होवे। (उस) अधर्मचर्या विषमचर्या के लिये उसे नरकपाल नरक में ले जायें; क्या वह यह (कहने) पा सकता है—‘मैं माता-पिता के लिये अधर्मचारी=विषमधारी हुआ, नरक वालो! मत मुझे नरक में (डालों)’? या उसके माता-पिता यह (कहने) पा सकते हैं—‘यह हमारे लिये, अधर्मचारी=विषमचारी हुआ, नरकपालो! मत इसे नरक में डालो’?”

“नही, भो सारिपुत्त! बल्कि उसे चिल्लाते ही को नरकपाल (=निरय-पाल) नरक में डाल देंगे।”

“तो क्या मानते हो, धानंजानि! यहाँ कोई पुत्र-दारा के लिये अधर्मचारी=विषमचारी होवें। ॰। ॰ दास-कर्मकर पुरूषों के लिये ॰। ॰ मित्र-अमात्यों (=यार दोस्तों) के लिये ॰। ज्ञाति-सालोहितों (=भाई-बंदों) के लिये ॰। ॰ अतिथियों के लिये ॰। ॰ पूर्व-प्रेतों के लिये ॰। ॰ देवताओं के लिये ॰। ॰ राजा के लिये ॰। ॰ काया के तर्पण वर्द्धन के लिये अधर्मचारी ॰ होवें। ॰ क्या वह यह (कहने) पा सकता है—‘मैं शरीर के तर्पण वर्द्धन के लिए अधर्मचारी-विषमचारी हुआ, नरकपालों! मत मुझे नरक में (डालों)’? या दूसरे यह (कहने) पा सकते हैं—‘यह काया के तर्पण वर्द्धन के लिये अधर्मचारी=विषमचारी हुआ, नरकपालों! मत इसे नरक में (डालों)’?”

“नहीं, भो सारिपुत्त! बल्कि उस चिल्लाते ही को नरकपाल नरक में डाल देंगे।”

“तो क्या मानते हो, धानंजाति! जो कि माता-पिता के हेतु अ-धर्मचारी=विषमचारी होना है और जो कि माता-पिता के हेतु धर्मचारी=समचारी होना; इन दोनों (कर्मो) में कौन श्रेय (=अच्छा) हे?”

“भो सारिपुत्त! माता-पिता के हेतु अधर्मचारी=विषमचारी होना, यह श्रेय नहीं; किन्तु जो कि माता-पिता के हेतु धर्मचारी-समचारी होना है, यही श्रेय है। अधर्मचर्या=विषमचर्या से भो सारिपुत्त! धर्मचर्या=समचर्या श्रेय है।”

“धानंजानि! दूसरे भी स-हेतुक (=फलदायक) धार्मिक कर्मान्त (=पेशे) हैं, जिनसे माता-पिता का पोषण किया जा सकता है, किन्तु पाप-कर्म को न करना और पुण्य-मार्ग को ग्रहण करना (चाहिये)।

“तो क्या मानते हो, धानंजाति! जो कि पुत्र-दारा के हेतु अधर्मचारी=विषमचारी होना ॰। ॰ दास-कर्मकर-पुरूषों के हेतु ॰। ॰ मि.-अमात्यों के हेतु ॰। ॰ ज्ञाति-सालोहितों के हेतु ॰। अतिथियों के हेतु ॰। ॰ पूर्व-प्रेतो के हेतु ॰। ॰ देवताओं के हेतु ॰। ॰ राजा के हेतु ॰। ॰ काया के तर्पण बर्द्धन हेतु ॰ पुण्यमार्ग का ग्रहण करना (चाहिये)।”

तब धानंजानि ब्राह्मण आयुष्मान् सारिपुत्त के भाषण को अभिनंदित अनुमोदितकर आसन से उठकर चला गया।

दूसरे समय धानंजानि ब्राह्मण दुःखित=व्याधित बहुत बीमार हुआ। तब धानंजानि ब्राह्मण ने किसी पुरूष को बुलाया—‘आओ हे पुरूष! तुम जहाँ भगवान् हैं, वहाँ जाओ; जाकर मेरे वचन से भगवान् के चरणों को, शिर से वंदना करों—भन्ते! धानंजानि ब्राह्मण ॰ बहुत बीमार है, वह भगवान् के चरणों को शिर से वंदना करता है’। (फिर) जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्त हों, वहाँ जाओ, जाकर मेरे वचन से आयुष्मान् सारिपुत्त के चरणों को, शिर से वंदना करो—भन्ते! धानंजानि ब्राह्मत ॰ बहुत बीमार है, वह आयुष्मान् सारिपुत्त के चरणों को, शिर से वंदना करता है’; और यह भी कहो—‘अच्छा हो, भन्ते! यदि आयुष्मान् सारिपुत्त कृपा कर जहाँ धानंजानित ब्राह्मण का घर है, वहाँ चले’।”

“अच्छा, भन्ते (=स्वामी)!”—(कह) वह पुरूष धानंजानि ब्राह्मण को उत्तर दे, जहाँ भगवान् थे, वहाँ…जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे उस पुरूष ने भगवान् से यह कहा—“भन्ते! धानंजानि ब्राह्मण ॰ बहुत बीमार है, वह भगवान् के चरणों को, शिर से वंदना करता है।’ (फिर) जहाँ आयुष्मान् सारिपु. थे, वहाँ गया; जाकर आयुष्मान् सारिपुत्त को अभिवादन कर एक ओर बैठ…आयुष्मान् सारिपुत्त से बोला—‘भन्ते! धानंजानि ब्राह्मण ॰ बहुत बीमार है, ॰ अच्छा हो, भन्ते! यदि आयुष्मान् सारिपुत्त कृपाकर जहाँ धानंजानि ब्राह्मण का घर है, वहाँ चलें।”

आयुष्मान् सारिपुत्त ने मौन से स्वीकार किया। तब आयुष्मानृ सारिपुत्त पहिनकर पात्रचीवर ले, जहाँ धानंजानि ब्राह्मण का घर था, वहाँ गये; जाकर बिछे आसन पर बैठे। बैठकर आयुष्मान् सारिपुत्त ने धानंजानि बाह्मण से यह कहा—

“धानंजानि! ठीक तो है? (काल-)यापन तो हो रहा है, दुःखा वेदनायें हट तो रही हैं, लौट तो नहीं रही हैं? (व्याधिका) हटना तो मालूम हो रहा है; लौटना तो नहीं मालूम हो रहा है?”

“भो सारिपुत्त! मुझे ठीक नहीं है, नहीं यापन हो रहा हैं, भारी दुःखमय वेदनायें आ रही हैं, हटती नहीं हैं, (पीडा का) आना ही जान पडता है, जाना नहीं। जैसे, भो सारिपुत्त! (कोई) बलवान् पुरूष तीक्ष्ण शिखर से शिर को मथित करे, ऐसे ही, भो सारिपुत्त! बडे जोर की हवा मेरे शिर को ताडन करती है। भो सारिपुत्त! मुझे ठीक नहीं हैं ॰ (पीडा का) आना जी जान पडता है, जाना नहीं। जैसे, भो सारिपुत्त! (कोई) बलवान् पुरूष मजबुत रस्सी से शिर को…(जोर से) बाँध दे; ऐसे ही भो सारिपुत्त! मुझे बडे जोर की सी संवेदना है। नहीं ॰। जैसे, भो सारिपुत्त! चतुर गोघातक या गोघातक का अन्तेवासी तेज गो-विकर्तन (=गाय काटने के छूरे) से पेट को काटे ऐसे ही, भो सारिपुत्त! जोर से वायु मेरे पेट को काट रहे है। नहीं ॰। जैसे, भो सारिपुत्त! दो बलवान् पुरूष (किसी) अति दुर्बल पुरूष को अनेक बाहों से पकडकर भौर (की आग) पर तपायें, संतपायें; ऐसे ही, भो सारिपुत्त! मेरे शरीर में अत्यधिक दाह हो रहा है। मुझे ठीक नहीं, ॰।”

“तो क्या मानते हो, धानजानि! नरक अच्छा (=श्रेय) है, या तिर्यग् (=पशु)-योनि?”

“नरक से, भो सारिपुत्त! निर्यग्-योनि अच्छी है।”

“तो क्या मानते हो, धानंजानि! तिर्यग्योनि अच्छी है, या प्रेतलो?”

“॰. प्रेतलोक ॰।”

“॰ प्रेतलोक अच्छा है, या मनुष्य?”—”॰ मनुष्य ॰।”

“॰ मनुष्य अच्छे हैं या चातुर्महाराजि देव?”—”॰ चातुर्महाराजिक देव ॰।”

“॰ चातुर्महाराजिक देव ॰, या त्रायंस्त्रिश देव?”—”॰ त्रायंस्त्रिश देव ॰।”

“॰ त्रायंस्त्रिश देव ॰, या याम देव?”—”॰ याम देव ॰।”

“॰ याम देव ॰, या तुषित देव?”—”॰ तुषित देव ॰।”

“॰ तुषित देव ॰, या निर्माणरति देव?”—”॰ निर्माणरति देव ॰।”

“॰ निर्माणरति देव ॰, या परनिर्मितवशवर्ती देव?”—”॰ परानिर्मितवशवर्ती देव ॰!”

“तो क्या मानते हो, धानंजानि! परनिर्मितवशवर्ती देव अच्छे हैं, या ब्रह्मलोक?”

“ब्रह्मलोक आप सारिपुत्त कह रहे है! ब्रह्मलोक आप सारिपुत्त कह रहे हैं!!”

तब आयुष्मान् सारिपुत्त को यह हुआ—“यह ब्राह्मण ब्रह्मलोक के श्रद्धालु हैं; क्यों न मैं धानंजानि ब्राह्मण को ब्रह्मो की सहव्यता (=सारूप्य) का मार्ग उपदेशूँ।”—

“धानंजानि! ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग तुझे उपदेशता हूँ, उसे सुन, अच्छी तरह मन में करो कहता हूँ।”

“अच्छा, भो!”—(कह) धानंजानि ब्राह्मने आयुष्मान् सारिपुत्त को उत्तर दिया। आयुष्मान् सारिपुत्त ने यह कहा—

“क्या है, धानंजानि! ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग?—(1) यहाँ धानंजानि! भिक्षु मैत्रीपूर्ण चित्त से ॰ सारे लोक को पूर्ण कर विहार करता है यह भी धानंजानि ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग है। और फिर धानंजानि! (2) करूणापूर्ण चत्ति से ॰। (3) और फिर धानंजानि! मुदितापूर्ण चित्त से ॰। ॰ (4) उपेक्षापूर्ण चित्त से ॰ सारे लोक को पूर्ण कर विहरता है। यह भी धानंजानि! ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग है।”

“तो, भी सारिपुत्त! मेरे वचन से भगवान् के चरणों में शिर से वंदना करें—‘भन्ते! धानंजानि ब्राह्मण ॰ बहुत बीमार है, वह भगवान् के चरणों को, शिर से बढता करता है।”

तब आयुष्मान् सारिपुत्त ने धानंजानि ब्राह्मण को स-करणीय (=जहाँ पहुँचकर आगे भी कर्तव्य करने को बाकी रहता है), हित, ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित कर आसन से उठ चल दिये। तब आयुष्मान् सारिपुत्त के चले जाने के थोडे ही समय बाद धानंजानि ब्राह्मण मर गया; और (जाकर) ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुआ।

तब भगवान् ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया—

“भिक्षुओ! यह सारिपुत्त धानंजानि ब्राह्मण को स-करणीय, हित (रूप) ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित कर आसन से उठकर चल दिया।”

तब आयुष्मान् सारिपुत्त जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् सारिपुत्त ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! धानंजानि ब्राह्मण ॰ बहुत बीमार है, वह भगवान् के चरणों को, शिर से वंदना करता है।”

“क्यो सारिपुत्त! तूने धानंजाति ब्राह्मण को स-करणीय, हित, ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित कर आसन से उठकर चला आया?”

“भन्ते! मुझे ऐसा हुआ — ब्राह्मण ब्रह्मलोक के प्रति श्रद्धालु होते है; क्यों न मैं धानंजानि ब्राह्मण को, ब्रह्मों की सहव्यता का मार्ग उपदेशूँ।”

“सारिपुत्त! धानंजानि ब्राह्मण मर गया, और (जाकर) ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुआ है।”

टीकाएँ [4]