ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवंत श्रावस्ति के पास अनाथपिंडीका के जेतवन में विहार कर रहे थे। वहां सारिपुत्र ने भिक्षुओं से कहा: “आदरणीय भिक्षुओं”।
“हाँ आदरणीय”, भिक्षुओं ने सारिपुत्र को जवाब दिया। सारिपुत्र ने भिक्षुओं से कहा:
“आदरणीयों, ‘सम्यक् दृष्टि सम्यक् दृष्टि’, कहते हैं। किस तरह से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है?”
“आदरणीय, हम बहुत दूर से भी आएंगे, आयुष्यमान सारिपुत्र के पास यह उपदेष का अर्थ सुन ने के लिये। आदरणीय सारिपुत्र ही इस का अर्थ स्पष्ट करें तो अच्छा। जैसे आदरणीय सारिपुत्र कहेंगे वैसे ही भिक्षु याद रखेंगे”।
“तो आदरणीयों, सुनो, और अच्छी तरह से मन में धारण करो, कहता हूँ”।
“हाँ आदरणीय”, भिक्षुओं ने सारिपुत्र को जवाब दिया। आयुष्यमान सारिपुत्र ने ऐसा कहा:
“आदरणीयों, जब आर्यश्रावक अकुशल को समझता है, अकुशल के मूल को समझता है, कुशल को समझता है, कुशल के मूल को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है।
और अकुशल क्या है, अकुशल का मूल क्या है, कुशल क्या है, कुशल का मूल क्या है? प्राणघात अकुशल है, चोरी अकुशल है, कामभोग में दुराचार अकुशल है, झूठ बोलना अकुशल है, बदनामी करना अकुशल है, कठोर वाणी अकुशल है, बकवास करना अकुशल है, लालच, दुर्भावना, और गलत दृष्टि अकुशल है—इसे आदरणीयों अकुशल कहा जाता है।
अकुशल का मूल क्या है? लोभ अकुशल का मूल है, द्वेष अकुशल का मूल है, मोह अकुशल का मूल है—इसे अकुशल का मूल कहा जाता है।
कुशल क्या है? प्राणघात न करना कुशल है, चोरी न करना कुशल है, कामभोग में दुराचार न करना कुशल है, झूठ न बोलना कुशल है, बदनामी न करना कुशल है, कठोर वाणी न बोलना कुशल है, बकवास न करना कुशल है, लालच रहितता, सद्भावना, और सही दृष्टि कुशल है—इसे कुशल कहा जाता है।
कुशल का मूल क्या है? अलोभ, अद्वेष, और अमोह कुशल का मूल है—इसे कुशल का मूल कहा जाता है।
इस प्रकार, जब आर्यश्रावक अकुशल को समझता है, अकुशल के मूल को समझता है, कुशल को समझता है, कुशल के मूल को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अज्ञान का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यसाधक आहार को समझता है, आहार के उदय को समझता है, आहार के निरोध को समझता है, आहार के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है।
आदरणीयों, आहार क्या है, आहार का उदय क्या है, आहार का निरोध क्या है, आहार के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, जीवितों के पालन पोषण के लिये और पैदा होने वालों की सहायता के लिये, चार प्रकार के आहार होते हैं। कौन से चार? खाने के लिये रूक्ष या बारीक ठोस आहार, संवेदना का संपर्क वह दूसरा, मानसिक संकल्प वह तीसरा, चैतन्य वह चौथा। तृष्णा के उदय के साथ आहार का उदय होता है, तृष्णा के निरोध के साथ आहार का निरोध होता है, आहार के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक आहार को समझता है, आहार के उदय को समझता है, आहार के निरोध को समझता है, आहार के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यसाधक दुःख को समझता है, दुःख के उदय को समझता है, दुःख के निरोध को समझता है, दुःख के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यसाधक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, दुःख क्या है, दुःख का उदय क्या है, दुःख का निरोध क्या है, दुःख के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? जन्म दुःख है, बुढ़ापा दुःख है, मौत दुःख है, शोक, विलाप, पीड़ा, विषाद, निराशा दुःख है, अप्रिय से संयोग दुःख है, प्रिय से जुदाई दुःख है, जो चाहता हो वह न मिलना दुःख है, संक्षिप्त में पांच ग्रहण-आधीन खंड दुःख है—इसे आदरणीयों दुःख कहा जाता है। और आदरणीयों, दुःख का उदय क्या है? यही वह तृष्णा है, जिसकी वजह से पुनर्जन्म होता है, जो अलग अलग जगह में लालसा के कारण आनंद खोजती है, अर्थात—कामतृष्णा, भवतृष्णा, विभवतृष्णा—इसे आदरणीयों, दुःख का उदय कहा जाता है। और आदरणीयों, दुःख का निरोध क्या है? यही तृष्णा का धीरे धीरे संपूर्ण तौर पे थोड़ा सा भी अवषेश बचे बिना त्याग, विसर्जन, तृष्णा से मुक्ति, तृष्णा का अनिवास—इसे आदरणीयों, दुःख का निरोध कहा जाता है। और आदरणीयों, दुःख के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? वह यही आर्य अष्टांग मार्ग ही है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि। इसे आदरणीयों, दुःख के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग कहा जाता है।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक दुःख को समझता है, दुःख के उदय को समझता है, दुःख के निरोध को समझता है, दुःख के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अज्ञान का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक बुढ़ापे और मौत को समझता है, बुढ़ापे और मौत के उदय को समझता है, बुढ़ापे और मौत के निरोध को समझता है, बुढ़ापे और मौत के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। और आदरणीयों, बुढ़ापा और मौत क्या है, बुढ़ापे और मौत का उदय क्या है, बुढ़ापे और मौत का निरोध क्या है, बुढ़ापे और मौत के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? जो जो स्थान में जीवितों का बुढ़ापा, जीर्णता, दांतो का टूटना, बालों की सफ़ेदी, चमड़ी का मुरझाना, जीव-शक्ति का घटना, इंद्रियों की असफलता—इसे आदरणीयों, बुढ़ापा कहा जाता है। और आदरणीयों, मौत क्या है? जो जो स्थान में जीवितों का निधन, विघटन, अंतर्धान, मृत्यु, काल समाप्ति, खंडों के संयोजन का टूट जाना, देह को शब के तौर पर रख देना, जीव-इंद्रिय का विच्छेद—इसे आदरणीयों, मौत कहा जाता है। इस तरह बुढ़ापा और मौत है—इसे आदरणीयों, बुढ़ापा और मौत कहा जाता है। जन्म के उदय के साथ बुढ़ापे और मौत का उदय होता है, जन्म के निरोध के साथ बुढ़ापे और मौत का निरोध होता है, बुढ़ापे और मौत के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक बुढ़ापे और मौत को समझता है, बुढ़ापे और मौत के उदय को समझता है, बुढ़ापे और मौत के निरोध को समझता है, बुढ़ापे और मौत के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अज्ञान का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक जन्म को समझता है, जन्म के उदय को समझता है, जन्म के निरोध को समझता है, जन्म के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, जन्म क्या है, जन्म का उदय क्या है, जन्म का निरोध क्या है, जन्म के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? जो जो स्थान में जीवितों का जन्म, उदय, गर्भधारण, आगमन, इंद्रियों की स्थापना—इसे आदरणीयों, जन्म कहा जाता है। अस्तित्व के उदय के साथ जन्म का उदय होता है, अस्तित्व के निरोध के साथ जन्म का निरोध होता है, जन्म के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक जन्म को समझता है, जन्म के उदय को समझता है, जन्म के निरोध को समझता है, जन्म के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक अस्तित्व को समझता है, अस्तित्व के उदय को समझता है, अस्तित्व के निरोध को समझता है, अस्तित्व के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, अस्तित्व क्या है, अस्तित्व का उदय क्या है, अस्तित्व का निरोध क्या है, अस्तित्व के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, तीन प्रकार के अस्तित्व होते हैं—कामलौक में अस्तित्व, रूपलोक में अस्तित्व, अरूपलोक में अस्तित्व। ग्रहण के उदय के साथ अस्तित्व का उदय होता है, ग्रहण के निरोध के साथ अस्तित्व का निरोध होता है, अस्तित्व के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक अस्तित्व को समझता है, अस्तित्व के उदय को समझता है, अस्तित्व के निरोध को समझता है, अस्तित्व के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक ग्रहण को समझता है, ग्रहण के उदय को समझता है, ग्रहण के निरोध को समझता है, ग्रहण के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, ग्रहण क्या है, ग्रहण का उदय क्या है, ग्रहण का निरोध क्या है, ग्रहण के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, चार प्रकार का ग्रहण होता है—कामभोग का ग्रहण, मान्यताओं का ग्रहण, रीत-रिवाजों का ग्रहण, आत्मवाद का ग्रहण। तृष्णा के उदय के साथ ग्रहण का उदय होता है, तृष्णा के निरोध के साथ ग्रहण का निरोध होता है, ग्रहण के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक ग्रहण को समझता है, ग्रहण के उदय को समझता है, ग्रहण के निरोध को समझता है, ग्रहण के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक तृष्णा को समझता है, तृष्णा के उदय को समझता है, तृष्णा के निरोध को समझता है, तृष्णा के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, तृष्णा क्या है, तृष्णा का उदय क्या है, तृष्णा का निरोध क्या है, तृष्णा के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, छह प्रकार की तृष्णा होती है—रूप तृष्णा, घ्वनि तृष्णा, गंध तृष्णा, स्वाद तृष्णा, स्पर्ष तृष्णा, मानसिक प्रवृत्ति की तृष्णा। संवेदना के उदय के साथ तृष्णा का उदय होता है, संवेदना के निरोध के साथ तृष्णा का निरोध होता है, तृष्णा के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक तृष्णा को समझता है, तृष्णा के उदय को समझता है, तृष्णा के निरोध को समझता है, तृष्णा के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक संवेदना को समझता है, संवेदना के उदय को समझता है, संवेदना के निरोध को समझता है, संवेदना के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, संवेदना क्या है, संवेदना का उदय क्या है, संवेदना का निरोध क्या है, संवेदना के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, छह प्रकार की संवेदना होती है—आंख, कान, नाक, ज़बान, काया, और मन के संपर्क की वजह से उत्पन्न हुइ संवेदना। संपर्क के उदय के साथ संवेदना का उदय होता है, संपर्क के निरोध के साथ संवेदना का निरोध होता है, संवेदना के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक संवेदना को समझता है, संवेदना के उदय को समझता है, संवेदना के निरोध को समझता है, संवेदना के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक संपर्क को समझता है, संपर्क के उदय को समझता है, संपर्क के निरोध को समझता है, संपर्क के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, संपर्क क्या है, संपर्क का उदय क्या है, संपर्क का निरोध क्या है, संपर्क के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, छह प्रकार के संपर्क होते हैं—आंख, कान, नाक, ज़बान, काया, और मन के द्वार पर उत्पन्न हुआ संपर्क। छह इंद्रियों के उदय के साथ संपर्क का उदय होता है, छह इंद्रियों के निरोध के साथ संपर्क का निरोध होता है, संपर्क के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक संपर्क को समझता है, संपर्क के उदय को समझता है, संपर्क के निरोध को समझता है, संपर्क के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक छह इंद्रियों को समझता है, छह इंद्रियों के उदय को समझता है, छह इंद्रियों के निरोध को समझता है, छह इंद्रियों के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, छह इंद्रियां क्या है, छह इंद्रियों का उदय क्या है, छह इंद्रियों का निरोध क्या है, छह इंद्रियों के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, छह प्रकार की इंद्रियां होती हैं—आंख, कान, नाक, जीभ, काया, और मनोइंद्रिय। नाम-रूप के उदय के साथ छह इंद्रियों का उदय होता है, नाम-रूप के निरोध के साथ छह इंद्रियों का निरोध होता है, छह इंद्रियों के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक छह इंद्रियों को समझता है, छह इंद्रियों के उदय को समझता है, छह इंद्रियों के निरोध को समझता है, छह इंद्रियों के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक नाम-रूप को समझता है, नाम-रूप के उदय को समझता है, नाम-रूप के निरोध को समझता है, नाम-रूप के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, नाम-रूप क्या है, नाम-रूप का उदय क्या है, नाम-रूप का निरोध क्या है, नाम-रूप के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? संवेदना, संज्ञान, चैतन्य, संपर्क, मनोलक्ष्य—इसे आदरणीयों, नाम कहा जाता है; चार महाभूत तत्व और उनसे उत्पन्न हए रूप—इसे आदरणीयों, रूप कहा जाता है। इस तरह नाम है इस तरह रूप है—इसे आदरणीयों, नाम-रूप कहा जाता है। चैतन्य के उदय के साथ नाम-रूप का उदय होता है, चैतन्य के निरोध के साथ नाम-रूप का निरोध होता है, नाम-रूप के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक नाम-रूप को समझता है, नाम-रूप के उदय को समझता है, नाम-रूप के निरोध को समझता है, नाम-रूप के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक ग्रहण को समझता है, ग्रहण के उदय को समझता है, ग्रहण के निरोध को समझता है, ग्रहण के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, चैतन्य क्या है, चैतन्य का उदय क्या है, चैतन्य का निरोध क्या है, चैतन्य के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, छह प्रकार के चैतन्य होते हैं—चक्षु चैतन्य, कर्ण चैतन्य, नाक चैतन्य, जीभ चैतन्य, काया चैतन्य, मन चैतन्य। संस्कार के उदय के साथ चैतन्य का उदय होता है, संस्कार के निरोध के साथ चैतन्य का निरोध होता है, चैतन्य के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक चैतन्य को समझता है, चैतन्य के उदय को समझता है, चैतन्य के निरोध को समझता है, चैतन्य के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हुं’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—
इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”। “बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक संस्कार को समझता है, संस्कार के उदय को समझता है, संस्कार के निरोध को समझता है, संस्कार के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, संस्कार क्या है, संस्कार का उदय क्या है, संस्कार का निरोध क्या है, संस्कार के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, तीन प्रकार के संस्कार होते हैं—काया संस्कार, वाणी संस्कार, चित्त संस्कार। अविद्या के उदय के साथ संस्कार का उदय होता है, अविद्या के निरोध के साथ संस्कार का निरोध होता है, संस्कार के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक संस्कार को समझता है, संस्कार के उदय को समझता है, संस्कार के निरोध को समझता है, संस्कार के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक अविद्या को समझता है, अविद्या के उदय को समझता है, अविद्या के निरोध को समझता है, अविद्या के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है। आदरणीयों, अविद्या क्या है, अविद्या का उदय क्या है, अविद्या का निरोध क्या है, अविद्या के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? यहां आदरणीयों, दुःख का अज्ञान, दुःख के उदय का अज्ञान, दुःख के निरोध का अज्ञान, दुःख के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग का अज्ञान—इसे आदरणीयों, अविद्या कहा जाता है। अशुद्धियों के उदय के साथ अविद्या का उदय होता है, अशुद्धियों के निरोध के साथ अविद्या का निरोध होता है, अशुद्धियों के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक अविद्या को समझता है, अविद्या के उदय को समझता है, अविद्या के निरोध को समझता है, अविद्या के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
“बहुत अच्छा आदरणीय” ऐसा कहके भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से सहमत और खुश हुए और फिर उन्होंने दूसरा सवाल पूछा: “लेकिन आदरणीय, कोई दूसरी रीति है जिस से आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”?
“है, आदरणीयों। जब आर्यश्रावक अशुद्धियों को समझता है, अशुद्धियों के उदय को समझता है, अशुद्धियों के निरोध को समझता है, अशुद्धियों के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है—तब आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है।
आदरणीयों, अशुद्धियां क्या है, अशुद्धियों का उदय क्या है, अशुद्धियों का निरोध क्या है, अशुद्धियों के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग क्या है? आदरणीयों, तीन प्रकार की अशुद्धियां होती हैं—कामभोग की अशुद्धि, अस्तित्व की अशुद्धि, अविद्या की अशुद्धि। अविद्या के उदय के साथ अशुद्धियों का उदय होता है, अविद्या के निरोध के साथ अशुद्धियों का निरोध होता है, अशुद्धियों के निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग वह केवल आर्य अष्टांग मार्ग है—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कार्य, सम्यक् आजीविका, सम्यक् उद्यम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि।
इस प्रकार, आदरणीयों, जब आर्यश्रावक अशुद्धियों को समझता है, अशुद्धियों के उदय को समझता है, अशुद्धियों के निरोध को समझता है, अशुद्धियों के निरोध की ओर ले जानेवाले मार्ग को समझता है, तब वह संपूर्ण तौर पर लालसा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, घृणा की आंतरिक मनोवृत्ति का त्याग करता है, ‘मैं हूँ’ यह दृष्टि और अभिमान की आंतरिक मनोवृत्ति का विनाश करता है, और अविद्या का त्याग कर के, ज्ञान का उदय कर के यहीं वर्तमान में दुःख का अंत करता है—इस तरह आदरणीयों, आर्यश्रावक सम्यक् दृष्टिवान कहलाता है, जिसकी दृष्टि सीधी है, जिसे आर्यधर्म में अटल श्रद्धा है, और जो सद्धर्म में आ पहुंचा है”।
सारिपुत्र ने भिक्षुओं से ऐसा कहा। वह भिक्षु सारिपुत्र के वचनों से संतुष्ट और आनंदित हुए।
सम्यक् दृष्टि सूत्र की समाप्ति।
टीकाएँ [5]
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